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________________ 114] [ प्रज्ञापनासूत्र अधस्तन-ग्न वेयक, (5) मध्यम-मध्यम-ग्र वेयक, (6) मध्यम-उपरिम-ग्रे वेयक, (7) उपरिम-अधस्तनग्रे वेयक, (8) उपरिम-मध्यम- वेयक और (9) उपरिम-उपरिम-ग्रं वेयक में रहने वाले / [2] ते समासतो दुविहा पण्णत्ता / तं जहा–पज्जतगा य अपज्जत्तगा य / से तं गेबेज्जगा / [146-2] ये (उपर्युक्त नौ प्रकार के ग्रे वेयक देव) संक्षेप में दो प्रकार के कहे गए हैंपर्याप्तक और अपर्याप्तक / यह ग्रेवेयकों का निरूपण हुआ। 147. [1] से कि तं प्रणुत्तरोववाइया? अणुत्तरोववाइया पंचविहा पण्णत्ता / तं जहा—विजया 1 वेजयंता 2 जयंता 3 अपराजिता 4 सम्वसिद्धा 5 / [147-1 प्र.] अनुत्तरोपपातिक देव कितने प्रकार के हैं ? [147-1 उ.] अनुत्तरौपपातिक देव पांच प्रकार के कहे गए हैं-(१) विजय, (2) वैजयन्त, (3) जयन्त, (4) अपराजित और (5) सर्वार्थसिद्ध, (विमानों में रहने वाले)। [2] ते समासतो विहा पण्णत्ता / तं जहा-पज्जत्तगा य अपज्जत्तगा य / से तं अणुत्तरोवबाइया। से तं कप्पाईया। से तं वेमाणिया। से तं देवा / से तं पंचिदिया। से तं संसारसमावण्णजीवपण्णवणा / से तं जीवपण्णवणा / से तं पण्णवणा। ॥पण्णवणाए भगवईए पढमं पण्णवणापयं समत्तं / / [147-2] ये संक्षेप में दो प्रकार के हैं--पर्याप्तक और अपर्याप्तक / यह हुई अनुत्तरोपपातिक देवों की प्ररूपणा / साथ ही उक्त कल्पातीत देवों का निरूपण पूर्ण हुना, और इससे सम्बन्धित वैमानिक देवों का निरूपण भी पूर्ण हुआ / इसके पूर्ण होने पर देवों का वर्णन भी पूर्ण हुया / साथ ही पंचेन्द्रिय जीवों का वर्णन भी पूरा हा। इसकी समाप्ति के साथ ही उक्त संसारसमापन्न जोवों की प्रज्ञापना पूर्ण हई; और इससे सम्बन्धित जीवप्रज्ञापना भी समाप्त हई। इस प्रकार यह प्रथम प्रज्ञापनापद पूर्ण हुअा। विवेचन-चतुर्विध देवों की प्रज्ञापना--प्रस्तुत नौ सूत्रों (सू. 136 से 147 तक) में चार प्रकार के देवों के भेद-प्रभेदों की प्ररूपणा की गई है। __ भवनवासी देवों का स्वरूप-जो देव प्रायः भवनों में निवास किया करते हैं, वे भवनवासी देव कहलाते हैं / यह कथन बहुलता से नागकुमार आदि देवों की अपेक्षा से समझना चाहिए, क्योंकि वे (नागकुमारादि) ही प्रायः भवनों में निवास करते हैं, कदाचित् आवासों में भी रहते हैं ; किन्तु असुरकुमार प्रायः प्रावासों में रहते हैं, कदाचित् भवनों में भी निवास करते हैं / भवन और ग्रावास में अन्तर यह है कि भवन तो बाहर से वृत्त (गोलाकार) तथा भीतर से समचौरस होते हैं, और नीचे कमल की कणिका के आकार के होते हैं। जबकि आवास कायप्रमाण स्थान वाले महामण्डप होते हैं, जो अनेक प्रकार के मणि-रत्नरूपी प्रदीपों से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करते हैं / भवनवासी देवों के प्रत्येक प्रकार के नाम के साथ संलग्न 'कुमार' शब्द इनकी विशेषता का द्योतक है। ये दसों ही प्रकार के देव कुमारों के समान चेष्टा करते हैं अतएव 'कुमार' कहलाते हैं। ये कुमारों की तरह सुकुमार होते हैं, इनकी चाल (गति) कुमारों की तरह मृदु, मधुर और ललित होती है / शृंगार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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