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________________ तेतीसवाँ अवधिपद] [195 2030. एवं मसाण वि। [2030] इसी प्रकार मनुष्यों के अवधिज्ञान के विषय में समझ लेना चाहिए। 2031. वाणमंतर-जोतिसिय-धेमाणियाणं जहा रइयाणं (सु. 2027) / // पण्णवणाए भगवतीए तेत्तीसइमं प्रोहिपयं समत्तं // [2031] वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों की वक्तव्यता (सू. 2027 में उक्त) नारकों के समान जाननी चाहिए / विवेचन-प्रानुगामिक प्रादि पदों के लक्षण-(१) प्रानुगामिक (अनुगामी) जो अवधिज्ञान अपने उत्पत्तिक्षेत्र को छोड़ कर दूसरे स्थान पर चले जाने पर भो अवधिज्ञानी के साथ विद्यमान रहता है, उसे पानगामिक कहते हैं. अर्थात जिस स्थान पर जिस जीव में यह अवधिज्ञान प्रकट होता है, वह जीव उस स्थान के चारों ओर संख्यात-असंख्यात योजन तक देखता है, इसी प्रकार उस जीव के दूसरे स्थान पर चले जाने पर भी वह उतने क्षेत्र को जानता-देखता है, वह प्रानुगामिक कहलाता है। (2) अनानुगामिक (अननुगामी)-जो साथ न चले, किन्तु जिस स्थान पर अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ, उसी स्थान में स्थित होकर पदार्थों को जाने, उत्पत्तिस्थान को छोड़ देने पर न जाने, उसे अनानुगामिक कहते हैं। तात्पर्य यह है कि अपने ही स्थान पर अवस्थित रहने वाला अवधिज्ञान अनानुगामी कहलाता है। (3) वर्धमान---जो अवधिज्ञान उत्पत्ति के समय अल्पविषय वाला हो और परिणामविशुद्धि के साथ प्रशस्त प्रशस्ततर अध्यवसाय के कारण द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा को लिए बढ़े अर्थात अधिकाधिक विषय वाला हो जाता है, वह 'वर्धमान' कहलाता है। (4) होयमान-~जो अवधिज्ञान उत्पत्ति के समय अधिक विषय वाला होने पर भी परिणामों की अशुद्धि के कारण क्रमशः अल्प, अल्पतर और अल्पतम विषय वाला हो जाए, उसे होयमान कहते हैं / (5) प्रतिपाती इसका अर्थ पतन होना, गिरना या समाप्त हो जाना है / जगमगाते दीपक के वायु के झोके से एकाएक बुझ जाने के समान जो अवधिज्ञान सहसा लुप्त हो जाता है उसे प्रतिपाती कहते हैं / यह अवधिज्ञान जीवन के किसी भी क्षण में उत्पन्न और लुप्त भी हो सकता है / (6) अप्रतिपाती-जिस अवधिज्ञान का स्वभाव पतनशील नहीं है, उसे अप्रतिपाती कहते हैं / केवलज्ञान होने पर भी अप्रतिपाती अवधिज्ञान नहीं जाता, क्योंकि वहाँ अवधिज्ञानावरण का उदय नहीं होता, जिससे जाए; अपितु वह केवलज्ञान में समाविष्ट हो जाता है / केवलज्ञान के समक्ष उसकी सत्ता अकिचित्कर है। जैसे कि सूर्य के समक्ष दीपक का प्रकाश। यह अप्रतिपाती अवधिज्ञान बारहवे गुणस्थानवी जीवों के अन्तिम समय में होता है और उसके बाद तेरहवाँ गुणस्थान प्राप्त होने के प्रथम समय के साथ केवलज्ञान उत्पन्न हो जाता है। इस अप्रतिपाती अवधिज्ञान को परमावधिज्ञान भी कहते हैं / हीयमान और प्रतिपाती में अन्तर यह है कि हीयमान का तो पूर्वापेक्षया धीरे-धीरे ह्रास हो जाता है, जबकि प्रतिपाती दीपक की तरह एक ही क्षण में नष्ट हो जाता है / (7) अवस्थितजो अवधिज्ञान जन्मान्तर होने पर भी प्रात्मा में अवस्थित रहता है या केवलज्ञान की उत्पत्तिपर्यन्त ठहरता है, वह अवस्थित अवधिज्ञान कहलाता है। (8) अनवस्थित जल की तरंग के समान जो अवधिज्ञान कभी घटता है, कभी बढ़ता है, कभी प्राविर्भूत हो जाता है और कभी तिरोहित हो जाता Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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