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________________ प्रथम प्रज्ञापनापद / [ 103 [137 उ.] सूक्ष्मसम्पराय-चारित्रार्य दो प्रकार के हैं -संक्लिश्यमान-सूक्ष्मसम्पराय-चारित्रार्य और विशुद्धचमान-सूक्ष्मसम्पराय-चारित्रार्य / / यह हुआ उक्त सूक्ष्मसम्पराय-चारित्रार्यों का निरूपण / 138. से कि तं प्रहक्खायचरित्तारिया ? अहक्खायचरितारिया दुविहा पण्णत्ता। तं जहा-छउमस्थग्रहक्खायचरित्तारिया य केवलिअहक्खायचरित्तारिया य / सेत्तं महक्खायचरित्तारिया। से तं चरित्तारिया। से तं प्रणिडिपत्तारिया / से तं प्रारिया। से तं कम्मभूमगा। से तं गब्भववतिया / से तं मणुस्सा। [138 प्र.] यथाख्यात-चारित्रार्य किस प्रकार के हैं ? [138 उ.] यथाख्यात-चारित्रार्य दो प्रकार के कहे गए हैं-छद्मस्थयथाख्यात-चारित्रार्य और केवलियथाख्यात-चारित्रार्य / यह हुआ उक्त यथाख्यात-चारित्रार्यों का (निरूपण / ) इसके पूर्ण होने के साथ ही) चारित्रार्य का वर्णन (समाप्त हुा / ) इस प्रकार पार्यों का वर्णन, कर्मभूमिजों का वर्णन तथा उक्त गर्भजों के वर्णन के समाप्त होने के साथ ही मनुष्यों की प्ररूपणा पूर्ण हुई। विवेचन-समन मनुष्यजीवों की प्रज्ञापना--प्रस्तुत 47 सूत्रों (सू. 92 से 138 तक) में मनुष्यों के सम्मूच्छिम और गर्भज इन दो भेदों का उल्लेख करके गर्भजों के कर्मभूमक, अकर्मभूमक और अन्तरद्वीपज, यों तीन भेद और फिर इनके भेद-प्रभेदों का निरूपण किया गया है / कर्मभूमक और अकर्मभूमक की व्याख्या-कर्मभूमक-प्रस्तुत में कृषि-वाणिज्यादि जीवननिर्वाह के कार्यों को तथा मोक्षसम्बन्धी अनुष्ठान को कर्म कहा गया है / जिनकी कर्मप्रधान भूमि है, वे 'कर्मभूम' या 'कर्मभूमक' कहलाते हैं। अर्थात्---कर्मप्रधान भूमि में रहने और उत्पन्न होने वाले मनुष्य कर्मभूमक हैं / प्रकर्मभूमक--जिन मनुष्यों की भूमि पूर्वोक्त कर्मों से रहित हो, जो कल्पवृक्षों से ही अपना जीवन निर्वाह करते हों, वे अकर्मभूम या अकर्मभूमक कहलाते हैं।' 'अन्तरद्वीपक' मनुष्यों की व्याख्या-अन्तर शब्द मध्यवाचक है। अन्तर में अर्थात्-लवणसमुद्र के मध्य में जो द्वीप है, वे अन्तरद्वीप कहलाते हैं। उन अन्तरद्वीपों में रहने वाले अन्तरद्वीपग या अन्तरद्वीपक कहलाते हैं। ये अन्तरद्वीपग मनुष्य अट्ठाईस प्रकार के हैं, जिनका मूल पाठ में नामोल्लेख है। अन्तरद्वीपग मनुष्य वज्रऋषभनाराचसंहनन वाले, कंकपक्षी के समान परिणमन वाले, अनुकूल वायुवेग वाले एवं समचतुरस्रसंस्थान वाले होते हैं। उनके चरणों की रचना कच्छप के समान आकार बाली एवं सुन्दर होती है। उनकी दोनों जांघे चिकनी, अल्परोमयुक्त, कुरुविन्द के समान गोल होती हैं। उनके घुटने निगूढ़ और सम्यक्तयाबद्ध होते हैं, उनके उरूभाग हाथी की सूड के समान गोलाई से युक्त होते हैं, उनका कटिप्रदेश सिंह के समान, मध्यभाग वन के समान, नाभिमण्डल दक्षिणावर्त शंख के समान तथा वक्षःस्थल विशाल, पुष्ट एवं श्रीवत्स से लाञ्छित होता है। उनकी भुजाएँ नगर के फाटक की अर्गला के समान दीर्घ होती हैं। हाथ की कलाइयां (मणिबन्ध) सुबद्ध होती हैं / उनके करतल और पदतल रक्तकमल के समान लाल होते हैं। उनकी गर्दन चार अंगुल की, सम और वृत्ताकार शंख-सी होती है। उनका मुखमण्डल शरद्ऋतु के चन्द्रमा के समान सौम्य होता है / उनके छत्राकार मस्तक पर अस्फुटित-स्निग्ध, कान्तिमान एवं चिकने केश होते हैं / 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 50 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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