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________________ प्रथम प्रतिपत्ति : अप्काय का अधिकार] [55 इस प्रकार हे आयुष्मन् ! हे श्रमणो! ये बादर पृथ्वीकायिक जीव प्रत्येकशरीरी हैं और असंख्येय लोकाकाशप्रमाण कहे गये हैं। यह बादर पृथ्वीकाय का वर्णन हुआ और इसके साथ ही पृथ्वीकाय का अधिकार पूर्ण हुआ। अपकाय का अधिकार 16. से कि त आउकाइया ? आउक्काइया दुविहा पण्णत्ता, तं जहासुहुमआउक्काइया य बायरआउक्काइया य / सुहुमआउक्काइया दुविहा पण्णता, तंजहापज्जसा य अपज्जताय / तेसि णं भंते ! जीवाणं कति सरीरया पण्णत्ता ? गोयमा! तओ सरीरया पण्णत्ता, तंजहा-- ओरालिए, तेयए, कम्मए, जहेव सुहुम पुढविक्काइयाणं, गवरं थिबुगसंठिता पण्णता, सेस तं चेव जाव दुगतिया दुआगतिया परिसा असंखेज्जा पण्णता। से तं सुहुमआउपकाइया। [16] अप्कायिक क्या हैं ? अप्कायिक जीव दो प्रकार के कहे गये हैं, जैसे कि सूक्ष्म अप्कायिक और बादर अप्कायिक / सूक्ष्म अपकायिक जीव दो प्रकार के हैं, जैसे कि पर्याप्त और अपर्याप्त / भगवन् ! उन जीवों के कितने शरीर कहे गये हैं ? गौतम ! उनके तीन शरीर कहे गये हैं, जैसे कि औदारिक, तैजस और कार्मण / इस प्रकार सब द्वारों को वक्तव्यता सूक्ष्म पृथ्वीकायिकों की तरह कहना चाहिए / विशेषता यह है कि संस्थान द्वार में उनका स्तिबुक (बुद्बुद रूप) संस्थान कहा गया है / शेष सब उसी तरह कहना यावत् वे दो गति वाले, दो आगति वाले हैं, प्रत्येकशरीरी हैं और असंख्यात कहे गये हैं / यह सूक्ष्म अप्काय का अधिकार हुमा / बादर अपकायिक 17. से किं तं बायरआउक्काइया ? बायरआउक्काइया प्रणेगविहा पण्णता, तं जहा--ओसा, हिमे, जाव जे यावन्ने तहप्पगारा, ते समासओ दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-पज्जत्ता य अपज्जत्ता य / तं चेव सव्वं णवरं थिगसंठिता, चत्तारि लेसाओ, आहारो नियमा छद्दिसि, उववाओ तिरिक्ख जोणिय मणुस्स देवेहि, ठिई जहन्नेणं अंतोमुत्तं उक्कोसं सत्तवाससहस्साई; Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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