________________ [जीवाजीवाभिगमसूत्र पृथ्वी सबका माधार होने से उसे प्रथम ग्रहण किया है / पृथ्वी के आधार पर पानी रहा हुधा है प्रतएव पृथ्वी के बाद जल का ग्रहण किया गया है। 'जत्थ जलं तत्थ वणं'' के अनुसार जहाँ जहाँ जल है वहाँ वहाँ वनस्पति है, इस सैद्धान्तिक तत्त्व के प्रतिपादन हेतु जल के बाद वनस्पति का ग्रहण हुआ है। इस प्रकार पृथ्वी, पानी और बनस्पतिकायिकों के क्रम का निरूपण किया गया है / पृथ्वीकाय का वर्णन 11. से कि पुढविकाइया ? पुढ विकाइया दुविहा पण्णत्ता, तं जहासुहमपुढविकाइया य बायरपुढविकाइया छ / [11] पृथ्वीकायिक का स्वरूप क्या है ? पृथ्वीकायिक दो प्रकार के कहे गये हैं-जैसे कि सूक्ष्मपृथ्वीकायिक और बादरपृथ्वीकायिक। 12. से कि सुहमपुढविकाइमा ? सुहमपुढविकाइया दुविहा पण्णत्तातं महा-पज्जत्तगा य अपज्जत्तगाम / [12] सूक्ष्मपृथ्वीकायिक क्या हैं ? सूक्ष्मपृथ्वीकायिक दो प्रकार के कहे गये हैंजैसे कि-पर्याप्तक और अपर्याप्तक / विवेचन—पृथ्वीकायिक जीव दो प्रकार के कहे गये हैं—१. सूक्ष्म पृथ्वीकायिक और 2. बादर पृथ्वीकायिक / सूक्ष्म पृथ्वीकाय से तात्पर्य सूक्ष्मनामकर्म के उदय से है, न कि बेर और आंवले की तरह आपेक्षिक सूक्ष्मता या स्थूलता से / सूक्ष्म नामकर्म के उदय से जिन जीवों का शरीर चर्मचक्षुओं से नहीं देखा जा सकता है, वे सूक्ष्म जीव हैं। ये सूक्ष्म जीव चतुर्दश रज्जुप्रमाण सम्पूर्ण लोक में सर्वत्र व्याप्त हैं। इस लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ सूक्ष्म जीव न हों। जैसे काजल की कुप्पी में काजल ठसाठस भरा रहता है अथवा जैसे गंधी की पेटी में सुगंध सर्वत्र व्याप्त रहती है इसी तरह सूक्ष्म जीव सारे लोक में ठसाठस भरे हुए हैं—सर्वत्र व्याप्त हैं / ये सूक्ष्म जीव किसी से प्रतिघात नहीं पाते। पर्वत की कठोर चट्टान से भी आर-पार हो जाते हैं। ये सूक्ष्म जीव किसी के मारने से मरते नहीं, छेदने से छिदते नहीं, भेदने से भिदते नहीं। विश्व की किसी भी वस्तु से उनका घात-प्रतिघात नहीं होता / ऐसे सूक्ष्मनामकर्म के उदय वाले ये सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीव सारे लोक में व्याप्त हैं।' बावर पृथ्वीकाय-बादरनामकर्म के उदय से जिन पृथ्वीकायिक जीवों का शरीर (अनेकों के मिलने पर) चर्मचक्षुषों से ग्राह्य हो सकता है, जिसमें घात-प्रतिघात होता हो, जो मारने से मरते 1. पुढवी चित्तमंतमक्खाया, अणेग जीवा, पुढो सत्ता प्रश्नत्थ सत्थपरिणएणं / -दशवै० 2. 'सुहमा सव्वलोगम्मि'। -उत्तराध्ययन Jain Education International Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org