________________ 24] [जीवाणीवाभिगम दस प्रकार भी कहते हैं / विवक्षा के भेद से कथनों में भेद होता है परन्तु उनमें विरोध नहीं होता। जो जीवा दो प्रकार के हैं वे ही दूसरी अपेक्षा से तीन प्रकार के हैं, अन्य अपेक्षा से चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ और दस प्रकार के हैं। अतएव इन नौ प्रकार की प्रतिपत्तियों में कोई विरोध नहीं है / अपेक्षा के भेद से सभी सम्यग् और सही हैं। वृत्तिकार ने 'प्रतिपत्ति' शब्द के सन्दर्भ में यह भी कहा है कि प्रतिपत्ति केवल शब्दरूप ही नहीं है अपितु शब्द के माध्यम से अर्थ में प्रवृत्ति कराने वाली है। शब्दाद्वैतवादी मानते हैं कि 'शब्दमात्रं विश्वम्' / सब संसार शब्दरूप ही है, ऐसा मानने से केवल शब्द ही सिद्ध होगा, विश्व नहीं / अतः उक्त मान्यता सत्य से परे है। सही बात यह है कि शब्द के माध्यम से अर्थ का कथन किया जाता है, तभी प्रतिपत्ति (ज्ञान) हो सकती है। स्याद्वाद या अपेक्षावाद जैन सिद्धान्त का प्राण है। अतएव नय-निक्षेप की अपेक्षाओं को घ्यान में रख कर वस्तुतत्त्व को समझना चाहिए। वस्तु अनन्तधर्मात्मक है। वह एकान्त एकरूप नहीं है। यदि वस्तु को सर्वथा एकरूप ही माना जायगा तो विश्व की विचित्रता संगत नहीं होगी। प्रथम प्रतिपत्ति का कथन 9. तत्थ गं जे एवमाहंसु 'दुविहा संसारसमावग्णगा जीवा पग्णता' ते एवमाहंसु तं जहातसा चेव थावरा चेव // [9] जो दो प्रकार के संसारसमापनक जीवों का कथन करते हैं, वे कहते हैं कि अस और स्थावर के भेद से वे दो प्रकार के हैं। 10. से कि तं थावरा? यावरा तिविहा पण्णत्ता, तं जहा१. पुढविकाइया 2. आउक्काइया 3. वणस्सइकाइया / [10] स्थावर किसे कहते हैं ? स्थावर तीन प्रकार के कहे गये हैं- . यथा-१. पृथ्वीकायिक 2. अप्कायिक और 3. वनस्पतिकायिक / विवेचन-संसारसमापन्न जीवों के भेद बताने वाली नौ प्रतिपत्तियों में से प्रथम प्रतिपत्ति का निरूपण करते हुए इस सूत्र में कहा गया है कि संसारवर्ती जीव दो प्रकार के हैं--प्रस और स्थावर / इन दो भेदों में समस्त संसारी जीवों का अन्तर्भाव हो जाता है। स-'सन्तीति साः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रा-जा सकते हैं, वे जीव अस कहलाते हैं। गर्मी से तप्त होने पर जो जीव उस स्थान से चल कर छाया स्थान पर आते हैं अथवा शीत से घबरा कर धूप में जाते हैं, वे चल-फिर सकने वाले जीव त्रस हैं। असनामकर्म के उदय वाले जीव त्रस कहलाते हैं, इस अपेक्षा से द्वीन्द्रिय, त्रीरिन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीव अस के अन्तर्गत आते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org