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________________ पंचविधात्या चतुर्थ प्रतिपत्ति] [121 द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय सूत्र में जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट सर्वत्र वनस्पतिकाल है / जो द्वीन्द्रिय से निकलकर अनन्तकाल तक वनस्पति में रहने के बाद फिर द्वीन्द्रियादि में उत्पन्न होने की अपेक्षा से समझना चाहिए। जिस प्रकार अन्तर विषयक पांच औधिक सूत्र कहे हैं उसी प्रकार पर्याप्त विषय में अपर्याप्त विषय में भी कह लेने चाहिए। अल्पबहुत्व द्वार 209. एएसि गं भंते ! एगिदियाणं बेइंदियाणं तेइंदियाणं चरिदियाणं पाँचवियाणं कयरे कयरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सव्वत्योवा पंचिदिया, चउरिदिया विसेसाहिया, तेइंदिया विसेसाहिया, बेइंदिया विसेसाहिया, एगिदिया अणंतगुणा। एवं अपज्जत्तगाणं सम्वत्थोवा पंचिदिया अपज्जत्तगा, चरिदिया अपज्जत्तगा विसेसाहिया, तेइंदिया अपज्जतगा विसेसाहिया, बेइंदिया अपज्जत्तगा विसेसाहिया, एगिदिया अपज्जत्तगा अणंतगुणा, सइंदिया अपज्जत्तगा विसेसाहिया। सम्वत्थोवा चरिदिया पज्जत्तगा, पंचिदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, बेइंदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, तेइंदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, एगिदिया पज्जत्तगा अणंतगुणा, सइंदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया। एतेसि णं भंते ! सइंदियाणं पज्जत्तग-अपज्जत्तगाणं कयरे कयरेहित्तो अप्पा वा०? गोयमा ! सव्वत्थोवा सइंदिया अपज्जत्तगा, सइंदियपज्जत्तगा संखेज्जगुणा / एवं एगिदियावि / एएसि णं भंते ! बेइंदियाणं पज्जत्तापज्जत्तगाणं अप्पाबहुं ? गोयमा ! सम्वत्थोवा बेइंदिया पज्जत्तगा अपज्जत्तगा असंखेज्जगुणा / एवं तेइंदिया चरिदिया पंचिदिया वि। एतेसि णं भंते ! एगिदियाणं, बेइंदियाणं, तेइंदियाणं चारदियाणं पंचिदियाण य पज्जत्तगाण य अपज्जत्तगाण य कयरे कयरेहितो अप्पा वा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा चरिदिया पज्जत्तगा, पंचिदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, बेइंदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, तेइंदिया पज्जत्तगा विसेसाहिया, पंचिदिया अपज्जत्तगा असंखेज्जगुणा, चरिदिया अपज्जत्ता विसेसाहिया, तेइंदिया अपज्जत्तगा विसेसाहिया, बेइंदिया अपज्जत्तगा विसेसाहिया, एगिदिया अपज्जतगा अणंतगुणा, सइंदिया अपज्जलगा विसेसाहिया, एगिदिया पज्जत्ता संखेज्जगुणा, सइंदियपज्जत्ता विसेसाहिया, सइंदिया विसेसाहिया / सेत्तं पंचविहा संसारसमावण्णगजीवा / / 209. भगवन् इन एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियों में कौन किससे अल्प, बहुत, तुल्य या विशेषाधिक हैं ? गौतम ! सबसे थोड़े पंचेन्द्रिय हैं, उनसे चतुरिन्द्रिय विशेषाधिक हैं, उनसे श्रीन्द्रिय विशेषाधिक हैं, उनसे द्वीन्द्रिय विशेषाधिक हैं और उनसे एकेन्द्रिय अनन्तगुण हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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