________________ 18] [जीवाजीवाभिगमसूत्र संजहा--अणंतरसिद्धासंसारसमावण्णग जीवाभिगमे य परंपरसिद्धासंसारसमावण्णग जीवाभिगमे य। से कि तं अणंतरसिद्धासंसारसमावण्णग-जीवाभिगमे ? अणंतरसिद्धासंसारसमावष्णग जीवाभिगमे पण्णरसविहे पण्णत्ते, तंजहा-तित्थसिद्धा जाध अणेगसिद्धा। से तं अणंतरसिद्धा० / से कि तं परंपरसिद्धासंसारसमावण्णग-जीवाभिगमे ? परंपरसिद्धासंसारसमावण्णग-जीवाभिगमे अणेगविहे पण्णते तंजहा--पढमसमय सिद्धा, दुसमयसिद्धा जाव अणंतसमयसिद्धा। से तं परंपरसिद्धासंसारसमावण्णग-जीवाभिगमे / से तं असंसारसमावण्णग-जीवाभिगमे। [7] असंसार-प्राप्त जीवाभिगम क्या है ? प्रसंसारप्राप्त जीवाभिगम दो प्रकार का है, यथा-अनन्तरसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम और परंपरसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम। अनन्तरसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम कितने प्रकार का कहा गया है ? अनन्तरसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम पन्द्रह प्रकार का कहा गया है, यथा तीर्थसिद्ध यावत् अनेकसिद्ध। यह अनन्तरसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम का कथन हुआ। परम्परसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम क्या है ? परम्परसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम अनेक प्रकार का कहा गया है। यथा-प्रथमसमयसिद्ध, द्वितीयसमय सिद्ध यावत् अनन्तसमयसिद्ध / यह परम्परसिद्ध असंसारप्राप्त जीवाभिगम का कथन हुआ। यह असंसारप्राप्त जीवाभिगम का कथन पूर्ण हुआ। विवेचन--अजीवाभिगम का कथन करने के पश्चात् प्रस्तुत सूत्रों में जीवाभिगम का कथन किया गया है / वैसे तो यह सब जीव-अजीव का ही कथन है, किन्तु इन दोनों के साथ जो 'अभिगम' पद लगा हुआ है वह यह बताने के लिए है कि इन जीवों और अजीवों में अभिगमगम्यता धर्म पाया जाता है। अर्थात ये जीव और अजीव ज्ञान के विषय (ज्ञेय) होते हैं। अद्वैतवादी मानते हैं कि जीव ज्ञान का विषय नहीं होता है / इसका खण्डन करने के लिए 'अभिगम' पद जीव-अजीव के साथ जोड़ा गया है / यदि जीव ज्ञान का विषय न हो तो उसका बोध ही नहीं होगा और स्वरूप को जाने बिना संसार से निवृत्ति एवं मोक्ष में प्रवृत्ति कैसे हो सकेगी? इस तरह शास्त्ररचना का प्रयोजन ही निरर्थक हो जावेगा। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org