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________________ 14] [जीवाजीवाभिगमसूत्र गति नहीं होती। धर्मास्तिकाय लोकाकाश में ही है इसीलिए जीवों और पुद्गलों की गति लोकाकाश तक ही सीमित है / इस प्रकार धर्मास्तिकाय के गतिसहायक रूप कार्य से उसके अस्तित्व की सिद्धि होती है। सकल धर्मास्तिकाय एक अखण्ड अवयवी द्रव्य है, वह स्कन्धरूप है। उसके असंख्यात प्रदेश अवयव रूप हैं / अवयवों का तथारूप संघात, परिणाम विशेष ही अवयवी है। जैसे तन्तुओं का पातानवितान रूप संघातपरिणाम ही पट है।' उनसे भिन्न पट और कुछ नहीं है। अवयव और अवयवी कथंचित् भिन्नाभिन्न हैं। 2. धर्मास्तिकाय का देश-धर्मास्तिकाय के बुद्धिकल्पित द्विप्रदेशात्मक, त्रिप्रदेशात्मक आदि विभाग को धर्मास्तिकाय का देश कहते हैं। वास्तव में तो धर्मास्तिकाय एक अखण्ड द्रव्य है। उसके देश-प्रदेश आदि विभाग बुद्धिकल्पित ही हैं। 3. धर्मास्तिकाय के प्रदेश स्कन्ध के ऐसे सूक्ष्म भाग को, जिसका फिर अंश न हो सके, प्रदेश कहते हैं। 'प्रदेशा निविभागा भागा:' अर्थात् स्कन्धादि के अविभाज्य निरंश अंश को प्रदेश कहते हैं / ये प्रदेश असंख्यात हैं अर्थात् लोकाकाशप्रमाण हैं / ये प्रदेश केवल बुद्धि से कल्पित किये जा सकते हैं / वस्तुतः ये स्कन्ध से अलग नहीं हो सकते। इस प्रकार धर्मास्तिकाय के तीन भेद बताये गये हैं स्कन्ध, देश और प्रदेश / प्रश्न हो सकता है कि धर्मद्रव्य को अस्तिकाय क्यों कहा गया है ? इसका समाधान है कियहाँ 'अस्ति' का अर्थ प्रदेश है और 'काय' का अर्थ संघात या समुदाय है। प्रदेशों के समुदाय को अस्तिकाय कहा जाता है। धर्मद्रव्य असंख्यात प्रदेशों का समूहरूप है अतएव उसे अस्तिकाय कहा जाता है। 4. अधर्मास्तिकाय-जीव और अजीव की स्थिति में सहायक होने वाला तत्त्व अधर्मास्तिकाय है। जैसे वृक्ष की छाया पथिक के लिए ठहरने में निमित्तकारण बनती है, इसी तरह अधर्मास्तिकाय जीव-पुद्गलों की स्थिति में सहायक होता है / / यह भी स्थिति में सहायक है, प्रेरक नहीं / जो भी स्थितिरूप भाव हैं वे सब अर्धास्तिकाय के होने पर ही होते हैं। धर्मास्तिकाय की तरह यह भी एक अखण्ड अविभाज्य इकाई है / यह असंख्यातप्रदेशी और सर्वलोकव्यापी है / 5-6. अधर्मास्तिकाय का देश और प्रदेश अधर्मास्तिकाय के तीन भेद हैं-स्कन्ध, देश और प्रदेश / सम्पूर्ण वस्तु को स्कन्ध कहते हैं। द्विप्रदेशी आदि बुद्धिकल्पित विभाग को देश कहते हैं और वस्तु से मिले हुए सबसे छोटे अंश को–जिनका फिर भाग न हो सके-प्रदेश कहते हैं। 1. तन्त्वादिव्यतिरेकेण, न पटाधुपलम्भनम् / तन्त्वादयोऽविशिष्टा हि, पटादिव्यपदेशिनः / / 2. अस्तयः प्रदेशास्तेषां कायः संघातः / 'गण काए य निकाए खंधे वग्गे य रासी य' इति वचनात अस्तिकायः प्रदेशसंघातः। -मलयगिरिवृत्ति 3. अहम्मो ठिइलक्खणो / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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