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________________ 398] [जीवाजीवाभिगमसूत्र समुद्गक यावत् धूप के कडुच्छुक-ये सब एक सौ आठ, एक सौ आठ वहां रखे हुए हैं / उस सिद्धायतन के ऊपर बहुत से आठ-आठ मंगल, ध्वजाएँ और छत्रातिछत्र हैं, जो उत्तम आकार के सोलह रत्न यावत् रिष्ट रत्नों से उपशोभित हैं।' उपपातादि सभा-वर्णन 140. तस्स गं सिद्धाययणस्स णं उत्तरपुरस्थिमेणं एस्य गं एगा महं उववायसभा पण्णता। जहा सुधम्मा तहेव जाव गोमाणसीओ। उयवायसमाए वि वारा मुहमंडवा सव्वं भूमिमागे तहेव जाव मणिफासो / (सुहम्मासभावत्तव्वया भाणियग्वा जाव मूमीए फासो।) तस्स णं बहुसमरमणिज्जस भूमिभागस्स बहुमन्सवेसभाए एस्थ गं एगा महं मणिपेढिया पण्णता जोयणं आयामविक्खंभेणं अवजोयणं बाहल्लेणं सम्यमणिमयो अच्छा / तोसे णं मणिपेटियाए उपि एत्थ णं एगे महं वेवसयणिज्जे पण्णत्ते / तस्स गं देवसयणिज्जस्स वण्णओ उववायसभाए गं उप्पि अट्ठमंगलगा नया छत्ताइछत्ता जाव उत्तिमागारा। तीसे णं उववायसभाए उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थ गं एगे महं हरए पण्णत्ते / से णं हरए अद्धतेरस जोयणाई आयामेणं छ जोयणाई सक्कोसाई विक्खंभेणं दस जोयणाई उम्वेहेणं अच्छे सण्हे षण्णओ जहेव गंवाणं पुक्खरिणीणं जाव तोरण वण्णओ। तस्स णं हरयस्स उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थ णं एगा महं अभिसेयसभा पण्णत्ता जहा सभा सुहम्मा तं चेव निरवसेसं जाव गोमाणसीओ भूमिभाए उल्लोए तहेव / तस्स णं बहुसमरमणिज्जस्स भूमिभागस्स बहुमजादेसभाए एस्थ णं एगा महं मणिपेडिया पण्णत्ता, जोयणं मायामविक्खंमेणं अवजोयणं बाहल्लेणं सव्वमणिमया अच्छा। तीसे गं मणिपेढियाए अपि एस्थ णं महं एगे सीहासणे पण्णत्ते सीहासणवण्णो अपरिवारो। तत्थ णं विजयदेवस्स सुबहुअभिसेक्के भंडे सणिक्खित्ते चिट्ठति / अभिसेयसभाए उप्पि अट्ठमंगलगा नाव उत्तिमागारा सोलसविहिं रयहिं उवसोहिए। तोसे णं अमिसेयसहाए उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थ णं एगा महं अलंकारियसमा बत्तम्बया भाणियल्या जाव गोमाणसीओ मणिपेढियाओ जहा अभिसेयसमाए उप्पि सोहासणं अपरिवारं। तस्थ णं विजयदेवस्स सुबहु अलंकारिए भंडे सन्निक्खित्ते चिटुइ / अलंकारियसभाए उपि मंगलगाया जाव छत्ताइछत्ता उत्तमागारा०। 1. अत्र संग्रहणिगाथे चंदणकलसा भिंगारगा य प्रायंसगा य थाला य / पाईओ सुपइट्टा मणगुलिया वायकरगा य // 11 // चित्ता रयणकरंडा हय-गय-नर-कंठगा य चंगेरी! पडला सीहासण-छत्त-चामरा समुग्गकजुया य // 2 // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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