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________________ 181 192 192 194 194 0 0 0 0 0 0 208 210 212 21 4 219 नवविध प्रल्पबहुत्व समुदायरूप में स्त्री-पुरुष-नपंसकों की स्थिति स्त्रियों को पुरुषों से अधिकता चतुर्विधाख्या तृतीय प्रतिपत्ति [ प्रथम उद्देशक ] चार प्रकार के संसारसमापन्नक' जीब नारकावासों की संख्या घनोदधि आदि को पृच्छा रत्नादिकाण्डों का बाहल्य रत्नप्रभादि में द्रव्यों की सत्ता नरकों का संस्थान सातों पृथ्वियों की अलोक से दूरी घनोदधि वातवलय का तिर्यग बाहल्य अपान्तराल और बाहल्य का यंत्र सर्वजीव-पुद्गलों का उत्पाद (रत्नप्रभा पृथ्वी) शाश्वत या प्रशाश्वत ? पृथ्वियों का विभागवार अन्तर बाहल्य की अपेक्षा तुल्यतादि [द्वितीय उद्देशक ] नरकभूमियों का वर्णन नारकावासों का संस्थान " के वर्णादि कितने बड़े हैं ? नरकासों में विकार उपपात संख्याद्वार अवगाहनाद्वार अवगाहनादर्शक यंत्र संहनन-संस्थानद्वार लेश्या प्रादि द्वार नारकों को भूख-प्यास एक-अनेक विकुर्वणा-वेदनादि नरकों में उष्णवेदना का स्वरूप नरकों में शीतवेदना का स्वरूप नरयिकों की स्थिति स्थितिदर्शक विभिन्न यंत्र 222 225 227 229 230 231 232 238 239 242 242 247 249 250 251 [ 39 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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