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________________ विद्युज्जिह्वा, 25. धनदन्त, 26. लष्टदन्त, 27. गूढदन्त और 28. शुद्धदन्त / इसी प्रकार शिखरी पर्वत की लवणसमुद्रगत दाढानों पर भी 28 अन्तर्वीप हैं। दोनों ओर के मिलाकर 56 अन्तर्वीप हो जाते हैं। एकोरुक द्वीप का प्रायाम-विष्कंभ तीन सौ योजन और परिधि नौ सौ उनपचास योजन है / वह एक पनवरवेदिका और एक बनखण्ड से चारों ओर से घिरा हुआ है। इस द्वीप का भूमिभाग बहुत समतल और रमणीय है / वहाँ बहुत सारे द्रुम, वृक्ष, वन, लता, गुल्म आदि हैं जो नित्य कुसुमित रहते हैं। वहाँ बहुत सो हरी भरी वनराजियां हैं / वहाँ दस प्रकार के कल्पवृक्ष हैं जिनसे वहां के निवासियों का जीवन-निर्वाह होता है / (1) मत्तांग नामक कल्पवृक्ष से उन्हें विविध पेयपदार्थों की प्राप्ति होती है। (2) भृतांग नामक कल्पवृक्ष से बर्तनों की पूर्ति होती है / (3) त्रुटितांग कल्पवृक्ष से वाद्यों की पूर्ति (4) दीपशिखा नामक कल्पवृक्ष से प्रकाश की पूर्ति होती है। (5) ज्योति-अंग नामक कल्पवृक्ष से सूर्य की तरह प्रकाश बौर सुहावनी धूप प्राप्त होती है। (6) चित्रांग नामक कल्पवृक्ष विविध प्रकार के चित्र एवं विविध मालाएं प्रदान करते हैं। (7) चित्तरसा नामक कल्पवृक्ष विविध रसयुक्त भोजन प्रदान करते हैं। (8) मण्यंग नामक कल्पवृक्ष विविध प्रकार के मणिमय प्राभूषण प्रदान करते हैं / (9) गेहागार नाम के कल्पवृक्ष विविध प्रकार के आवास प्रदान करते हैं और (10) अणिगण नाम के कल्पवक्ष उन्हें विविध प्रकार के वस्त्र प्रदान करते हैं / एकोरुक द्वीप के मनुष्य और स्त्रियां सुन्दर अंगोपांग युक्त, प्रमाणोपेत अवयव वाले, चन्द्र के समान सौम्य और अत्यन्त भोग-श्री से सम्पन्न होते हैं। नख से लेकर शिख तक के उनके अंगोपांगों का साहित्यिक और सरस वर्णन किया गया है / ये प्रकृति से भद्रिक होते हैं। चतुर्थ भक्त अन्तर से प्राहार की इच्छा होती है। ये मनुष्य आठ सौ धनुष ऊंचे होते हैं, 64 पृष्ठकरंडक (पांसलियां) होते हैं / उनपचास दिन तक अपत्य-पालना करते हैं। उनकी स्थिति जघन्य देशोन पल्योपम का असंख्येय भाग और उत्कृष्ट पल्योपम का असंख्येय भाग प्रमाण है। जब उनकी छह मास प्रायु शेष रहती है तब युगलिक-स्त्री सन्तान को जन्म देती है। ये युगलिक स्त्री-पुरुष सुखपूर्वक प्रायुष्य पूर्ण करके अन्यतर देवलोक में उत्पन्न होते हैं। ___एकोरुक द्वीप में गृह, ग्राम, नगर, असि, मसि, कृषि प्रादि कर्म, हिरण्य-सुवर्ण प्रादि धातु, राजा और सामाजिक व्यवस्था, दास्यकर्म वैरभाव, मित्रादि, नटादि के नृत्य, वाहन, धान्य, डांस-मच्छर, युद्ध, रोग, अतिवृष्टि, लोहे प्रादि धातु की खान, क्रय विक्रय प्रादि का प्रभाव होता है / वह भोगभूमि है / इसी तरह सब अन्तद्वीपों का वर्णन समझना चाहिए / __ कर्मभूमिज मनुष्य कर्मभूमियों में और अकर्मभूमिज मनुष्य अकर्मभूमि में पैदा होते हैं / कर्मभूमि वह है जहाँ मोक्षमार्ग के उपदेष्टा तीथंकर उत्पन्न होते हैं, जहाँ असि (शस्त्र) मषि (लेखन-व्यापार आदि) और कृषि कर्म करके मनुष्य अपना जीवन-निर्वाह करते हैं / ऐसी कर्मभूमियां पन्द्रह हैं-५ भरत, 5 एरवत और 5 महाविदेह / (ये भरत आदि एक एक जम्बूद्वीप में, दो-दो घातकीखण्ड में और दो-दो-पुष्करार्ध द्वीप में हैं।) यहाँ के मनुष्य अपने पुरुषार्थ के द्वारा कर्मों का क्षय करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं / ये अपने-अपने पुण्य-पाप के अनुसार चारों गतियों में उत्पन्न हो सकते हैं। जहां असि-मसि-कृषि नहीं है किन्तु प्रकृति प्रदत्त कल्पवृक्षों द्वारा जीवन निर्वाह है वह अकर्मभूमि है। अकर्मभूमियां 30 हैं पांच हैमवत, पांच हैरण्यवत्त, पांच हरिवास, पांच रम्यकवास, पांच देवकुरु और पांच उत्तरकरु / इनमें से एक-एक जम्बूद्वीप में, दो-दो धातकीखण्ड में और दो-दो पुष्करार्धद्वीप में हैं। 30 प्रकर्मभ्रमि और 56 अन्तर्वीप भोगभूमियां हैं। यहाँ युगलिक धर्म है-चारित्र धर्म यहाँ नहीं है। [ 30 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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