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________________ द्वितीय प्रतिपत्ति : नपुंसकों का अल्पबहुत्व] [179 उनसे चतुरिन्द्रिय ति. यो. नपुंसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे असंख्येय योजन कोटीकोटीप्रमाण अाकाशप्रदेश राशिप्रमाण घनीकृत लोक की एक प्रादेशिक श्रेणियों में जितने आकाशप्रदेश हैं, उतने प्रमाण वाले हैं। उनसे त्रीन्द्रिय ति. यो. नपुसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रभूततर श्रेणिगत आकाशप्रदेशराशिप्रमाण हैं। __ उनसे द्वीन्द्रिय ति. यो. नपुंसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रभूततम श्रेणिगत आकाशप्रदेशराशिप्रमाण हैं। उनसे तेजस्कायिक एकेन्द्रिय ति. यो. नपुसक असंख्यातगुण हैं, क्योंकि वे सूक्ष्म और बादर मिलकर असंख्येय लोकाकाश प्रदेशप्रमाण हैं / ___ उनसे पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय ति. यो. नपुंसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रभूत असंख्येय लोकाकाशप्रदेशप्रमाण हैं। ___ उनसे अप्कायिक एके. ति. यो. नपुंसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रभूततर असंख्येय लोकाकाशप्रदेशप्रमाण हैं। __ उनसे वायुकायिक एके. ति. यो. नपुसक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रभूततम असंख्येय लोकाकाशप्रदेशप्रमाण हैं / . उनसे वनस्पतिकायिक एके. तिर्यक्योनिक नपुंसक अनन्तागुण हैं, क्योंकि वे अनन्त लोकाकशप्रदेश राशिप्रमाण हैं / (4) मनुष्यनपुसकसंबंधी अल्पबहुत्व सबसे थोड़े अन्तर्वीपिज मनुष्य-नपुसक / ये संमूछिम समझने चाहिए, क्योंकि गर्भज मनुष्यनपुसकों का वहाँ सद्भाव नहीं होता / कर्मभूमि से संहृत हुए हो भी सकते हैं / अन्तर्वीपिज मनुष्य नपुसकों से देवकुरु-उत्तरकुरु अकर्मभूमि के मनुष्य नपुसक संख्येयगुण हैं, क्योंकि तद्गत गर्भजमनुष्य अन्तर्वीपिक गर्भजमनुष्यों से संख्येयगुण हैं, क्योंकि गर्भजमनुष्यों के उच्चार आदि में संमूछिम-मनुष्यों की उत्पत्ति होती है / स्वस्थान में परस्पर तुल्य हैं। उनसे हरिवर्ष-रम्यकवर्ष अकर्मभूमिक मनुष्य नपुसक संख्येयगुण हैं और स्वस्थान में तुल्य उनसे हैमवत-हैरण्यवत के अकर्मभूमिक मनुष्य नपुसक संख्येयगुण हैं और स्वस्थान में तुल्य हैं / उनसे भरत-ऐरवत कर्मभूमि के मनुष्य नपुसक संख्येयगुण हैं और स्वस्थान में तुल्य हैं। उनसे पूर्व विदेह-पश्चिमविदेह कर्मभूमि के मनुष्य नपुंसक संख्येयगुण हैं और स्वस्थान में दोनों परस्पर तुल्य हैं। सर्वत्र युक्ति पूर्ववत् जाननी चाहिए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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