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________________ 154] [जीवाजीवाभिगमसूत्र तिरिक्जोणियपुरिसाणं जहन्नेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं वणस्सइकालो। एवं जाव खहयरतिरिक्खजोणियपुरिसाणं। मणुस्सपुरिसाणं भंते ! केवइयं कालं अंतरं होइ ? गोयमा ! खेत्तं पडुच्च जहन्नेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेण वणस्सइकालो। चम्मचरणं पडुच्च जहन्लेणं एक्कं समयं उक्कोसेण अणंतकालं अणंताओ उस्सप्पिणी-ओसप्पिणीओ जाव अवट्ट पोग्गलपरियटें देसूर्ण। कम्मभूमगाणं जाय विदेहो जाव धम्मचरणे एक्को समओ सेसं जहित्थीणं जाव अंतरदीवगाणं / देवपुरिसाणं जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं वणस्सइकालो। भवणवासिदेवपुरिसाणं ताव जाव सहस्सारो, जहन्नेणं अंतोमुहूत्तं उक्कोसेणं वणस्सइकालो। ____ आणतदेवपुरिसाणं भंते ! केवइयं कालं अंतरं होई ? गोयमा! जहन्नेण वासपुहत्तं उक्कोसेण वणस्सइकालो। एवं जाय गेवेज्जदेवपुरिसस्स वि। अणुत्तरोववाइयदेवपुरिसस्स जहन्नेणं वासपुहुत्तं उक्कोसेणं संखेज्जाइं सागरोवमाई साइरेगाई। [55] भंते ! पुरुष का अन्तर कितना कहा गया है ? (अर्थात् पुरुष, पुरुष-पर्याय छोड़ने के बाद फिर कितने काल पश्चात् पुरुष होता है ?) गौतम ! जघन्य से एक समय और उत्कर्ष से वनस्पतिकाल के बाद पुरुष पुनः पुरुष होता है। भगवन् ! तिर्यक्योनिक पुरुषों का अन्तर कितना कहा गया है ? गौतम ! जघन्य से अन्तर्मुहुर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल का अन्तर है। इसी प्रकार खेचर तिर्यक्योनि पर्यन्त के विषय में जानना चाहिए। भगवन् ! मनुष्य पुरुषों का अन्तर कितने काल का है ? गौतम ! क्षेत्र की अपेक्षा जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल का अन्तर है। धर्माचरण की अपेक्षा जघन्य से एक समय और उत्कृष्ट से अनन्त काल अर्थात् इस अवधि में अनन्त उत्सपिणियां-अवसर्पिणियां बीत जाती हैं यावत् वह देशोन अर्धपुद्गल परावर्तकाल होता है / ___ कर्मभूमि के मनुष्य का यावत् विदेह के मनुष्यों का अन्तर यावत् धर्माचरण की अपेक्षा एक समय इत्यादि जो मनुष्यस्त्रियों के लिए कहा गया है वही यहां कहना चाहिए। अन्तर्वीपों के अन्तर तक उसी प्रकार कहना चाहिए। देवपुरुषों का जघन्य अन्तर अन्तर्महर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल है / यही कथन भवनवासी देवपुरुष से लगा कर सहस्रार देवलोक तक के देव पुरुषों के विषय में समझना चाहिए। भगवन् ! आनत देवपुरुषों का अन्तर कितने काल का कहा गया है ? गौतम ! जघन्य से वर्षपृथक्त्व (पाठ वर्ष) और उत्कर्ष से वनस्पतिकाल का अन्तर होता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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