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________________ द्वितीय प्रतिपत्ति: अन्तरद्वार] [139 गोयमा ! जम्मणं पडुच्च जहन्नं दसवाससहस्साइं अंतोमुत्तममहियाई; उक्कोसेणं वणस्सइकालो / संहरणं पडुच्च जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं वणस्सइकालो। एवं जाव अंतरवीवियानो। देविस्थियाणं सव्वासि जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण वणस्सइकालो। [49] भगवन् ! स्त्री के पुनः स्त्री होने में कितने काल का अन्तर होता है ? (स्त्री, स्त्रीत्व का त्याग करने के बाद पुन: कितने समय बाद स्त्री होती है ?) ___गौतम ! जघन्य से अन्तर्मुहर्त और उत्कर्ष से अनन्तकाल अर्थात् वनस्पतिकाल / ऐसा सब तियंचस्त्रियों के विषय में कहना चाहिए। ___मनुष्यस्त्रियों का अन्तर क्षेत्र की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल / धर्माचरण की अपेक्षा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट अनन्तकाल यावत् देशोन अपार्धपुद्गलपरावर्तन / इसी प्रकार यावत् पूर्व विदेह और पश्चिमविदेह की मनुष्यस्त्रियों की वक्तव्यता कहनी चाहिए। भंते ! अकर्मभूमिक मनुष्यस्त्रियों का अन्तर कितना कहा गया है ? गौतम ! जन्म की अपेक्षा जघन्य अन्तर्महत अधिक दस हजार वर्ष और उत्कर्ष से वनस्पतिकाल / संहरण की अपेक्षा से जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल। इस प्रकार यावत् अन्तद्वीपों की स्त्रियों का अन्तर कहना चाहिए। सभी देवस्त्रियों का अन्तर जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कर्ष से बनस्पतिकाल है। विवेचन-प्रस्तुत सूत्र में अन्तर बताया गया है / अन्तर का अर्थ है काल का व्यवधान / स्त्री स्त्रीपर्याय का परित्याग करके पुनः जितने समय के बाद स्त्रोपर्याय को प्राप्त करती है वह कालव्यवधान स्त्री का अन्तर कहलाता है। सामान्य विवक्षा में स्त्रीवेद का अन्तर जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट से अनन्तकाल अर्थात् वनस्पतिकाल है / इसकी भावना इस प्रकार है कोई स्त्री मरकर स्त्रीपर्याय से च्युत होकर पुरुषवेद या नपुंसकवेद का अन्तर्मुहूर्त काल तक अनुभव करके वहां से मरकर पुनः स्त्रीरूप में उत्पन्न हो, इस अपेक्षा से जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तकाल का होता है। उत्कर्ष से वनस्पतिकाल का अन्तर होता है / असंख्येय पुद्गलपरावर्त का वनस्पतिकाल होता हैं / इस अनन्तकाल में काल की अपेक्षा अनन्त उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी बीत जाती हैं, क्षेत्र से अनन्त लोक और असंख्येय पूदगलपरावर्त निकल जाते हैं। ये पुद्गलपरावर्त प्रावलिका के अन्दर जितने समय होते हैं उसका असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।' इतने लम्बे काल तक स्त्रीत्व का व्यवच्छेद हो जाता है और फिर स्त्रीत्व की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार औधिक तिर्यंचस्त्रियों का, जलचर थलचर खेचर स्त्रियों का और प्रौधिक मनुष्यस्त्रियों का अन्तर जानना चाहिए। 1. 'अणंताओ उस्सप्पिणी प्रोसप्पिणी कालो, खेत्तमो अणंता लोगा, असंखेज्जा पोग्गलपरिया,' एवं वनस्पति कालः. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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