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________________ प्रथम प्रतिपत्ति: देवों का वर्णन] [111 संहननद्वार-छहों संहननों में से एक भी संहनन नहीं होता, क्योंकि अस्थियों की रचना विशेष को संहनन कहते हैं और देवों के शरीर में न अस्थि है, न शिरा है और न स्नायु है / अतएव वे असंहननी हैं। किन्तु जो पुद्गल इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ, मन को संतुष्ट करने वाले नरम और कमनीय होते हैं, वे पुद्गल उनके शरीररूप में एकत्रित हो जाते हैं—परिणत हो जाते हैं। ___ संस्थानद्वार-भवधारणीय संस्थान तो समचौरस संस्थान है और उत्तरवैक्रिय नाना प्रकार का होता है, क्योंकि वे इच्छानुसार आकार बना सकते हैं। कषाय-चारों कषाय होते हैं / संज्ञा-चारों संज्ञाएँ होती हैं। लेश्या-छहों लेश्याएँ होती हैं। इन्द्रिय-पांचों इन्द्रियां होती हैं। समुद्घात-पांच समुद्धात होते हैं वैक्रिय, कषाय, मारणांतिक, वैक्रिय और तेजस समुद्घात। संजीद्वार-ये संज्ञी भी होते हैं और असंज्ञी भी होते हैं / जो गर्भव्युत्क्रान्तिक मर कर देव होते हैं वे संजी हैं और जो सम्मूछिमों से आकर उत्पन्न होते हैं वे असंज्ञी कहलाते हैं। देवद्वार-ये स्त्रीवेदी और पुवेदी होते हैं / नपुंसकवेद वाले नहीं होते। पर्याप्तिद्वार, दृष्टिद्वार और दर्शनद्वार-नैरयिकों की तरह / ज्ञानद्वार—ये ज्ञानी भी हैं और अज्ञानी भी हैं / जो ज्ञानी हैं वे नियम से तीन ज्ञान वाले हैं-मति, श्रुत और अवधि / जो अज्ञानी हैं उनमें कोई दो अज्ञान वाले हैं और कोई तीन अज्ञान वाले हैं। जो तीन अज्ञान वाले हैं वे मति-प्रज्ञान, श्रत-अज्ञान और विभंगज्ञान वाले हैं। जो दो अज्ञान वाले हैं वे मति-अज्ञान, श्रुत-प्रज्ञान वाले हैं / जो असंज्ञियों से आकर उत्पन्न होते हैं, उनकी अपेक्षा से दो अज्ञान होते हैं / यह भजना का तात्पर्य है। उपयोग और आहारद्वार-नैरयिकवत् जानना चाहिए। अर्थात् साकार और अनाकार दोनों तरह से उपयोग होते हैं / छहों दिशाओं से आहार ग्रहण करते हैं। उपपातद्वार--संज्ञीपंचेन्द्रिय, असंजीपंचेन्द्रिय तिर्यंच और गर्भज मनुष्यों से आकर उत्पन्न होते हैं, शेष जीवस्थानों से नहीं। स्थितिद्वार--इनकी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष की और उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागरोपम की है। ___ समवहतद्वार-मारणांतिकसमुद्घात से समवहत होकर भी मरते हैं और असमवहत होकर भी। च्यवनद्वार-ये देव मरकर पृथ्वी, पानी, वनस्पतिकाय में, गर्भज और संख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंच पंचेन्द्रिय और मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं / शेष जीवस्थान में नहीं जाते। गति-आगतिद्वार-इसलिए वे दो गति में जाने वाले और दो गति से आने वाले हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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