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________________ 52 ] | अन्तकृद्दशा ____तए णं से वस देवे राया अट्ठारससेणीप्पसेणीयो सद्दावेइ, सद्दावित्ता एवं वयासो- "गच्छह गं तुब्भे देवाणुप्पिया! बारवईए नयरीए अभितरवाहिरिए उस्सुक्कं उक्करं अभडप्पवेस अंदाडिमकुडंडिमं अधरिमं अधारणिज्ज अणुद्धयमुइंगं अमिलायमल्लदामं गणियावरणाड इज्जकलियं अणेगतालायराणुचरितं पमुश्यपक्की लियाभिरामं जहारिहं ठिइवडियं दसदिवसियं करेह, करिता एयमाणत्तियं पच्चप्पिणह / ते वि करेन्ति, करित्ता तहेव पच्चप्पिणंति / तए णं से वसु देवे राया बाहिरियाए उवट्ठाणसालाए सीहासणवरगए पुरस्थाभिमुहे सन्निसन्ने सइएहि य साहस्सिएहि य सयसाहस्सिएहि य जाएहि दाएहि भोगेहि दलयमाणे दलयमाणे पडिच्छमाणे पडिच्छेमाणे एवं च णं विहरइ। ____तए णं तस्स अम्मापियरो पढमे दिवसे जातकम्मं करेन्ति, करित्ता बितियदिवसे जागरियं करेन्ति, करित्ता ततिय दिवसे चंदसूरदंसणियं करेन्ति, करित्ता एवामेव निव्वत्ते प्रसूइजातकम्मकरणे संपत्ते बारसाहदिवसे विपुलं असणं पाणं खाइमं साइमं उवक्खडावेन्ति, उवक्खडावित्ता मित्त-णाइणियग-सयण-संबंधि-परिजणं बलं च बहवे गणणायग-दंडनायग जाव प्रामंतेइ। तओ पच्छा व्हाया कयबलिकम्मा कयकोउय-मंगल-पायच्छित्ता सवालंकारविभूसिया महइमहालयंसि भोयणमंडवंसि तं विपुलं असणं पाणं खाइमं साइमं मित्तणाइ० गणणायग जाव सद्धि आसाएमाणा विसाएमाणा परिभाएमाणा परिभुजेमाणा एवं च णं विहरई। जिमियभुत्तत्तरागया वि य णं समाणा प्रायंता चोक्खा परमसुइभया तं मित्तनाइनियगसयणसंबंधिपरिजण० गणणायग० बिपलेणं पफ्फगंधमल्लालंकारेणं सक्काति. समाति, सक्कारिता सम्माणित्ता एवं वयासी-1 "जम्हा णं अम्ह इमे दारगे गयतालुसमाणे तं होउ णं अम्ह एयस्स दारगस्स नामधेज्जे गयस कुमाले 2 / तए णं तस्स दारगस्स अम्मापियरे नामं करेंति गयस कुमालोत्ति सेस जहा मेहे जाव' प्रलं भोगसमत्थे जाए यावि होत्था। तदनन्तर वह देवकी देवी अपने आवासगृह में शय्या पर सोई हुई थी। वह वासगृह (शयनकक्ष) [भीतर से चित्रित था, बाहर से श्वेत और घिसकर चिकना बनाया हुआ था / उसका उपरिभाग विविध चित्रों से युक्त था और नीचे का भाग सुशोभित था। मणियों और रत्नों के प्रकाश से उसका अंधकार नष्ट हो गया था। वह एकदम समतल सुविभक्त भाग वाला, पंचवर्ण के सरस और सुवासित पुष्प-पुजों के उपचार से युक्त था। उत्तम-कालागुरु, कुन्दरुक और तुरुष्क (शिलारस) की धूप से चारों ओर सुगन्धित, सुगन्धी पदार्थों से सुवासित एवं सुगन्धित द्रव्य की गुटिका के समान था। उसमें जो शय्या थी वह तकिया सहित, सिरहाने और पायते दोनों ओर तकियायुक्त थी। दोनों ओर से उन्नत और मध्य में कुछ नमी (झुकी हुई) थी। विशाल गंगा के किनारे की रेती के अवदाल (पैर रखने से फिसल जाने) के समान कोमल, क्षोमिक–रेशमी दुकलपट से आच्छादित, रजस्त्राण (उड़ती हुई धूल को रोकने वाले वस्त्र) से ढंकी हुई, रक्तांशुक (मच्छरदानी) सहित, सुरम्य आजिनक (एक प्रकार का चमड़े का कोमल वस्त्र) रुई, बूर, नवनीत, अर्कतूल (आक की रुई) के समान कोमल स्पर्श वाली, सुगन्धित उत्तम पुष्प, चूर्ण और अन्य शयनोपचार से युक्त थी। ऐसी शय्या पर सोई हई देवकी देवी ने अर्द्ध निद्रित अवस्था में अर्द्धरात्रि के समय उदार, कल्याण, शिव, धन्य, मंगलकारक और शोभन महास्वप्न देखा और जागृत हुई / 1. वर्ग 3, सूत्र 2. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003476
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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