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________________ तृतीय स्थान - प्रथम उद्देश ] [ 106 त्रास्त्रिशक और लोकपाल देव, अग्रमहिषी देवियां, पारिषद्य देव, अनीकाधिपति, तथा आत्मरक्षक देव तीन कारणों से शीघ्र मनुष्य लोक में आते हैं। (अरहन्तों के जन्म होने पर, अरहन्तों के प्रव्रजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय / ) (80) / विवेचन—जो आज्ञा-ऐश्वर्य के को छोड़ कर स्थान, आयु, शक्ति, परिवार और भोगोपभोग आदि में इन्द्र के समान होते हैं, उन्हें सामानिक देव कहते हैं। इन्द्र के मंत्री और पुरोहित स्थानीय देवों को त्रायस्त्रिश देव कहते हैं। यतः इनकी संख्या 33 होती है, अतः उन्हें त्रायस्त्रिश कहा जाता है। देवलोक का पालन करने वाले देवों को लोकपाल कहते हैं। इन्द्रसभा के सदस्यों को पारिषद्य, देवसेना के स्वामी को अनीकाधिपति और इन्द्र के अंग-रक्षक को आत्म-रक्षक कहते हैं। ८१-तिहि ठाणेहिं देवा अब्भुद्विज्जा, त जहा-अरहंतेहिं जायमाहि जाव त चेव [अरहतेहिं पव्वयमाहिं, अरहंताणं णाणुप्पायमहिमासु] / ८२--एवं प्रासणाई चलेज्जा, :सोहनायं करेज्जा, चेलुक्खेवं करेज्जा [तिहि ठाणेहि देवाणं आसणाइं चलेज्जा, तं जहा अरहतेहिं जायमाहि, अरहतेहि पन्वयमाहि, अरहताणं णाणुत्पायमहिमासु। ८३--तिहिं ठाणेहि देवा सीहणायं करेज्जा, तं जहा-अरहतेहि जायमाहिं, परहंतेहिं पव्वयमाहि, अरहंताणं णाणप्पायमहिमास / ८४—तिहि ठाणेहि देवा चेलुक्खेवं करेज्जा, तं जहा-अरहंतेहिं जायमाणेहि, प्ररहंतेहि पव्वयमाहि, अरहंताणं णाणुप्पायमहिमासु]। ८५-तिहि ठाणेहिं चेइयरुक्खा चलेज्जा, तं जहा–अरहंतेहिं [जायमाहि, अरहतेहिं पव्वयमाहि, अरहताणं गाणुप्यायमहिमासु] / ८६-तिहिं ठाणेहि लोगंतिया देवा माणुसं लोग हव्वमागच्छेज्जा, तं जहा--अरहतेहिं जायमाहि, प्ररहंतेहिं पन्वयमाहिं अरहताणं णाणुप्पायमहिमासु। तीन कारणों से देव अपने सिंहासन से तत्काल उठ खड़े होते हैं--प्ररहन्तों के जन्म होने पर, (अरहन्तों के प्रबजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय) (81) / इसी प्रकार 'पासनों' का चलना, सिंहनाद करना और चेलोत्क्षेप करना भी जानना चाहिए। तीन कारणों से देवों के आसन चलायमान होते हैं-अरहन्तों के जन्म होने पर, अरहन्तों के प्रवजित होने के समय और परहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय (82) / तीन कारणों से देव सिंहनाद करते हैं----अरहन्तों के जन्म होने पर, अरहन्तों के प्रवजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय (83) / तीन कारणों से देव चेलोत्क्षेप (वस्त्रों का उछालना) करते हैं---अरहन्तों के जन्म होने पर, अरहन्तों के प्रवजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय (84) / ] तीन कारणों से देवों के चैत्य वृक्ष चलायमान होते हैं--अरहन्तों के जन्म होने पर [अरहन्तों के प्रवजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय (85) / ] तीन कारणों से लोकान्तिक देव तत्काल मनुष्य लोक में आते हैं-अरहन्तों के जन्म होने पर, अरहन्तों के प्रव्रजित होने के समय और अरहन्तों के केवलज्ञान उत्पन्न होने की महिमा के समय (86) / दुष्प्रतीकार-सूत्र ८७–तिण्हं दुष्पडियारं समणाउसो ! तं जहा-अम्मापिउणो, भट्ठिस्स, धम्मायरियस्स / 1. संपातोवि य णं केइ पुरिसे अम्मापियरं सयपागसहस्सपागेहिं तेल्लेहि अभंगेत्ता, सुरभिणा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003471
Book TitleAgam 03 Ang 03 Sthanang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages827
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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