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________________ २६ ] हूँ और आत्मा को (अपने आपको ) पाप सम्बन्धी व्यापारों से निवृत्त करता हूँ । - विवेचन – दूसरे अध्ययन में प्राणातिपात आदि सावद्य योग की निवृत्तिरूप सामायिक व्रत के उपदेशक तीर्थंकरों की स्तुति की गई है। तीर्थंकरों से उपदिष्ट व सामायिक व्रत गुरु महाराज' की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। इस कारण तथा गुरुवन्दनपूर्वक ही प्रतिक्रमण करने का शिष्टाचार होने से गुरुवन्दना करना आवश्यक है । अतएव 'गुरुवन्दन' नामक तृतीय अध्ययन प्रारम्भ करते हैं 'इच्छामि' – जैनधर्म इच्छाप्रधान धर्म है। साधक प्रत्येक साधना अपनी स्वयं की इच्छा से करता है, उस पर किसी का दबाव नहीं रहता है । चित्त की प्रसन्नता के अभाव में अरुचिपूर्वक या दबाव से की जाने वाली साधना, वस्तुत: साधना न होकर एक तरह से दण्ड रूप हो जाती है। दबाव से या भय के भाव से लादी हुई निष्प्राण धर्मक्रियाएं साधक के जीवन को उन्नत बनाने के बदले कुचल देती हैं। यही कारण है कि जैनधर्म की साधना में सर्वत्र 'इच्छामि खमासमणो', 'इच्छामि पडिक्कमामि' आदि रूप में सर्वप्रथम 'इच्छामि' का प्रयोग होता है । इच्छामि का अर्थ है - मैं चाहता हूँ अर्थात् मैं अन्त:करण की प्रेरणा से यह क्रिया करने अभिलाषी हूँ । 'खमासमणो' श्रमणः, शमनः, समनाः, समणः इन चारों शब्दों का प्राकृत में 'समणो' रूप बनता है। इन चारों के शब्दार्थ में किंचित् भिन्नता होने पर भी भावार्थ में भेद नहीं है। २. 'शमन ' को 'शमन' कहते हैं । १. 'श्रमण' - बारह प्रकार की तपस्या में श्रम अर्थात् परिश्रम करने वाले, अथवा इन्द्रिय एवं मन का दमन करने वाले को 'श्रमण' कहते हैं । - [ आवश्यकसूत्र - • क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय एवं नोकषाय रूपी अग्नि को शान्त करने वाले - ३. 'समन' शत्रु तथा मित्र पर समभाव रखने वाले को 'समन' कहते हैं । ४. 'समण' अच्छी तरह से जिनवाणी का उपदेश देने वाले, अथवा संयम के बल से कषाय को जीतकर रहने वाले को 'समण' कहते हैं। — 'श्रमु' धातु तप और खेद अर्थ में व्यवहृत होती है। अतः जो तपश्चरण करता है एवं संसार से सर्वथा निर्लिप्त रहता है, वह श्रमण कहलाता है । क्षमाप्रधान श्रमण क्षमाश्रमण होता है । अनुयोगद्वार सूत्र में आवश्यक के छह प्रकार बताये गये हैं - 'सामाइयं चउवीसत्थओ, वंदयणं, पडिक्कमणं, काउस्सग्गो पच्चक्खाणं ।' इनमें वन्दना तीसरा आवश्यक है। इसमें शिष्य गुरुदेव को वन्दन कर सम्बोधन करके कहता है हे क्षमाश्रमण गुरुदेव ! मैं अपनी शक्ति के अनुसार प्राणातिपात आदि सावध व्यापारों से रहित काय से वन्दना -
SR No.003464
Book TitleAgam 28 Mool 01 Avashyak Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla, Mahasati Suprabha
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1985
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Agam, Canon, Ritual, & agam_aavashyak
File Size4 MB
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