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________________ बारह व्रतों के अतिचारों का प्रतिक्रमण ] [११५ यथापरिमाण किया हो, उसके उपरान्त स्वेच्छा से काया से आगे जाकर पांच आश्रव सेवन का पच्चक्खाण जावज्जीवाए छठे एगविहं तिविहेणं – न करेमि मणसा, वयसा, कायसा एवं छठे दिशिव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तं जहा ते आलोउं - उड् ढदिसिप्पमाणाइक्कमे , अहोदिसिप्पमाणाइक्कमे , तिरियादिसिप्पमाणाइक्कमे, खित्तवुड्ढी, सइअन्तरद्धा, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं। भावार्थ - जो मैंने ऊर्ध्वदिशा, अधोदिशा और तिर्यदिशा का परिमाण किया है, उसके आगे गमनागमन आदि क्रियाओं को मन, वचन, काया से न करूंगा। यदि मैंने ऊर्ध्वदिशा, अधोदिशा और तिर्यदिशा का जो परिमाण किया है उसका उल्लंघन किया हो, क्षेत्र को बढ़ाया हो, क्षेत्रपरिमाण की सीमा में संदेह होने पर आगे चला होऊं तो मैं उसकी आलोचना करता हूँ। मेरे वे सब पाप मिथ्या हों। ऊंची, नीची, तिरछी दिशाओं के उल्लंघन को यहां अतिचार कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि मर्यादा की हुई भूमि से बाहर जाने की इच्छा कर रहा है लेकिन बाहर गया नहीं है तब तक अतिचार है, बाहर चले जाने पर अनाचार है। ७. उपभोग-परिभोगपरिमाणवत के अतिचार सातवां व्रत - उवभोग - परिभोगविहिं पच्चक्खायमाणे - १. उल्लणियाविहि, २. दन्तणविहि, ३. फलविहि, ४. अब्भंगणविहि, ५. उवट्टणविहि, ६. मजणविहि, ७. वत्थविहि, ८. विलेवणविहि, ९. पुप्फविहि, १०. आभरणविहि, ११. धूवविहि, १२. पेजविहि, १३. भक्खणविहि, १४. ओदणविहि, १५. सूपविहि, १६. विगयविहि, १७. सागविहि, १८. महुरविहि, १९. जीमणविहि, २०. पाणोअविहि, २१. मुखवासविहि, २२. वाहणविहि, २३. उवाहणविहि, २४. सयणविहि, २५. सचित्तविहि, २६. दव्वविहि, इत्यादि का यथापरिमाण किया है, इसके उपरान्त उवभोग-परिभोग वस्तु को भोग निमित्त से भोगने का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए, एगविहं तिविहेणं न करेमि मनसा, वयसा, कायसा एवं सातवां उवभोगपरिभोग दुविहे पन्नत्ते, तं जहा – भोयणाओ य, कम्मओ य। भोयणाओ समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तं जहा ते आलोउं - सचित्ताहारे, सचित्तपडिबद्धाहारे, अप्पउलिओसहिभक्खणया, दुप्पउलिओसहिभक्खणया, तुच्छीसो हिभक्खणया। कम्मओ य णं समणोवासएण पण्णरस कम्मादाणाइं जाणियव्वाइं न समायरियव्वाइं,तं जहा ते आलोउं - इंगालकम्मे, वणकम्मे, साडीकम्मे , भाडीकम्मे, फोडीकम्मे, दंतवाणिजे, लक्खवाणिजे, रसवाणिजे, केसवाणिजे, विसवाणिजे, जंतपीलणकम्मे , निल्लंछणकम्मे , दवग्गिदावणया, सरदहतलायसोसणया, असईजणपोसणया, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं। भावार्थ - मैंने शरीर पोंछने के अंगोछे आदि वस्त्र का, दातौन करने का, आँवला आदि फल से बाल धोने का, तेल आदि की मालिश करने का, उबटन करने का, स्नान करने के जल का, वस्त्र पहनने का,
SR No.003464
Book TitleAgam 28 Mool 01 Avashyak Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla, Mahasati Suprabha
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1985
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Agam, Canon, Ritual, & agam_aavashyak
File Size4 MB
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