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________________ बसवां उद्देशक ] सूत्र सूत्र ५ अनन्तकाय संयुक्त प्रहार करे । ६ प्रधाकर्म दोष का सेवन करे । सूत्र ७-८ सूत्र ९-१० शिष्य का अपहरण आदि करे । सूत्र ११-१२ दीक्षार्थी का अपहरण आदि करे । सूत्र सूत्र सूत्र १५-१६ सूत्र १९ - २४ सूत्र १३ १४ सूत्र वर्तमान या भविष्य सम्बन्धी निमित्त कहे । सूत्र २५ - २८ सूत्र २९ सूत्र ३० - ३३ सूत्र ३४-३५ सूत्र ३६-३६ पर्युषण (संवत्सरी) निश्चित दिन न करे और अन्य दिन करे । सूत्र सूत्र सूत्र सूत्र आने वाले साधु के आने का कारण जाने बिना आश्रय दे । कलह उपशान्त न करने वाले के या प्रायश्चित्त न करने वाले के साथ आहार करे । प्रायश्चित्त का विपरीत प्ररूपण करे या विपरीत प्रायश्चित्त दे । प्रायश्चित्त सेवन, उसके हेतु और संकल्प को सुनकर या जानकर भी उस भिक्षु के साथ आहार करे । सूर्योदय या सूर्यास्त के संदिग्ध होने पर भी आहार करे । रात्रि के समय मुख में प्राये उद्गाल को निगल जावे । ग्लान की सेवा न करे अथवा विधिपूर्वक सेवा न करे । चातुर्मास में विहार करे । ३८ पर्युषण के दिन तक लोच न करे । ३९ पर्युषण के दिन चौविहार उपवास न करे । ४० पर्युषणाकल्प गृहस्थों को सुना । ४१ चातुर्मास में वस्त्र ग्रहण करे । ऐसी प्रवृत्तियां का गुरुचौमासी प्रायश्चित्त श्राता है । इस उद्देशक के १६ सूत्रों के विषय का कथन निम्न आगमों में है, यथा सूत्र १- ४ अविनय आशातनाओं का कथन दशाश्रुतस्कन्ध दशा १ व ३ में, उत्तराध्ययन प्र. १ व अ. १७ में, दशवैकालिक प्र. ९ में तथा अन्य आगमों में भी हुआ है । परिष्ठापन करने का कथन आचा. श्रु.२, ५ अनन्तकाययुक्त आहार आ जाने पर उसके अ. १, उ. १ में है । Jain Education International [२१७ ६ प्रधाकर्म दोषयुक्त ग्रहार ग्रहण करने का निषेध प्राचा. श्रु. २, अ. १, उ. ९ तथा सूय. श्रु. १, अ. १०, गा. ८ व ११ में तथा अन्य अनेक स्थलों में है । निमित्त कथन का वर्णन उत्तरा. प्र. ८ अ १७ तथा प्र. २० में है । सूत्र ७-८ सूत्र २५ - २९ रात्रि भोजन निषेध के चार भाँगे और उद्गाल निगलने का सूत्र बृहत्कल्प उ. ५ में है । सूत्र ३४-३५ चातुर्मास में विहार करने का निषेध बृहत्कल्प उद्देश. १, सूत्र ३६ में है । सूत्र ४१ चातुर्मास में वस्त्र ग्रहण करने का निषेध बृहत्कल्प उद्देश. ३, सू. १६ में है । इस उद्देशक के २५ सूत्रों के विषय का कथन अन्य आगमों में नहीं है, यथासूत्र ९-१२ शिष्य व दीक्षार्थी सम्बन्धी इस तरह का स्पष्ट कथन व प्रायश्चित्त इनका समावेश तीसरे महाव्रत में हो सकता है । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003462
Book TitleAgam 24 Chhed 01 Nishith Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages567
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_nishith
File Size11 MB
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