SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 113
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रथम उद्देशक] [१३ सचित्त पदार्थ से हरी या सूखी वनस्पतियां, फल, फूल, बीज आदि सभी सचित्त पदार्थों का ग्रहण हो जाता है ऐसा समझना चाहिए तथा इत्रादि समस्त अचित्त पदार्थ सूघने का प्रायश्चित्त दूसरे उद्देशक में कहा गया है । गृहस्थ द्वारा पदमार्गादि निर्माणकरण प्रायश्चित्त ११. जे भिक्खू पदमग्गं वा, संकमं वा, अवलंबणं वा, अण्णउत्थिएण वा गारथिएण वा कारेइ कारेंतं वा साइज्जइ। १२. जे भिक्खू दगवीणियं अण्णउत्थिएण वा गारथिएण वा कारेइ कारेंतं वा साइज्जइ । १३. जे भिक्खू सिक्कगं वा, सिक्कगणंतगं वा अण्णउत्थिएण वा गारथिएण वा कारेइ कारेंतं वा साइज्जइ। १४. जे भिक्खू सोत्तियं वा रज्जुयं वा चिलमिलि अण्णउत्थिएण वा गारथिएण वा कारेइ कारेंतं वा साइज्जइ। ११. जो भिक्षु पदमार्ग = चलने का रास्ता, संक्रमण मार्ग = जल कीचड़ आदि को उल्लंघन करने का पाषाणादिमय मार्ग, अवलंबन = चढने, उतरने, चलने में सहारा लेने का साधन, अन्यतीथिक या गृहस्थ के द्वारा निर्माण करवाता है या करवाने वाले का अनुमोदन करता है। १२. जो भिक्षु पानी के निकलने की नाली अन्यतीथिक से या गृहस्थ से बनवाता है या बनवाने वाले का अनुमोदन करता है। १३. जो भिक्षु छींका या उसका ढक्कन अन्यतीथिक से या गृहस्थ से बनवाता है या बनवाने वाले का अनुमोदन करता है । १४. जो भिक्षु सूत की या डोरियों की चिलिमिलिका (पर्दा-यवनिका-मच्छरदानी) अन्यतीर्थिक या गृहस्थ से बनवाता है या बनवाने वाले का अनुमोदन करता है। (उसे गुरुमासिक प्रायश्चित्त आता है।) विवेचन-१. पदमार्ग--वर्षा आदि के कारण से मार्ग में जल या कीचड़ हो जाने पर उस मार्ग से जाना-पाना कठिन हो जाता है और जाने-आने में जीवों की विराधना होती है । अतः सुविधा के लिये उपाश्रय में या उसके पास चलने का जो मार्ग ईंट, पत्थर आदि रखकर बनाया जाता है उसे पदमार्ग कहते हैं। २. संक्रमणमार्ग-पत्थर आदि रखकर भूमि से कुछ ऊपर पुल के समान जो मार्ग बनाया जाता है उसे संक्रमणमार्ग कहते हैं। इस प्रकार जल नीचे बहता रहता है और ऊपर से जाने-माने की सुविधा हो जाती है। ३. अवलम्बन पुल आदि पर दोनों ओर कोई सहारे की आवश्यकता हो या कहीं चढ़नेउतरने में सहारे की आवश्यकता हो तो उसके लिए रस्सी, थंभा आदि का जो साधन बनाया जाता है वह "अवलंबन" कहा जाता है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003462
Book TitleAgam 24 Chhed 01 Nishith Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages567
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_nishith
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy