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________________ [जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र रायलक्खणविराइयंगमंगे, बहुजणबहुमाणपूइए, सव्वगुणसमिद्धे, खत्तिए, मुइए, मुद्धाहिसित्ते, माउपिउसुजाए, दयपत्ते, सीमंकरे, सीमंधरे, खेमंकरे, खेमंधरे, मणुस्सिदे, जणवयपिया, जणवयपाले, जणवयपुरोहिए, सेउकरे, केउकरे, णरपवरे, पुरिसवरे, पुरिससीहे, पुरिसवग्धे, पुरिसासीविसे, पुरिसपुंडरीए, पुरिसवरगंधहत्थी, अड्डे, दित्ते, वित्ते, वित्थिण्णविउलभवणसयणासणजाणवाहणाइणे, बहुधणबहुजायरूवरयए, आओगपओगसंपउत्ते, विच्छड्डियपउरभत्तपाणे, बहुदासीदासगोमहिसगवेलगप्पभूए, पडिपुण्णजंतकोसकोट्ठागाराउधागारे, बलवं, दुब्बलपच्चामित्ते ; ओहयकंटयं, निहयकंटयं, मलियकंटयं, उद्धियकंटयं, अकंटयं, ओहयसत्तुं निहयसत्तुं, मलियसत्तुं, उद्धियसत्तुं निज्जियसत्तुं पराइयसत्तुं, ववगयदुभिक्खं, मारिभयविप्पमुक्कं, खेमं, सिवं सुभिक्खं, पसंतडिंबडमरं ) रज्जं पसासेमाणे विहर । बिओ गमो रायवण्णगस्स इमो ९२ ] तत्थ असंखेज्जकालवासंतरेण उप्पज्जए जसंसी, उत्तमे, अभिजाए, सत्तवीरिय-परक्कमगुणे, पसत्थवण्णसरसारसंघयणतणुगबुद्धिधारणमेहासंठाणसीलप्पगई, पहाणगारवच्छायागइए, अणेगवयणप्पहाणे, तेयआउबलवीरियजुत्ते, अझुसिरघणणिचियलोहसंकलणारायवइरउसहसंघयणदेहधारी झस १. जुग, २. भिंगार, ३. वद्धमाणग ४. भद्दासण ५. संख ६. छत्त ७. वीण ८. पडाग ९. चक्क १०. जंगल ११. मूसल १२. रह १३. सोत्थिय १४. अंकुस १५. चंदाइच्च १६-१७. अग्गि १८. जूय १९. सागर २०. इंदज्झय २१. पुहवि २२. पउम २३. कुञ्जर २४. सीहासण २५. दंड २६. कुम्म २७. गिरिवर २८. तुरगवर २९. वरमउड ३०. कुंडल ३१. णंदावत ३२. धणु ३३. कोंत ३४. गागर ३५. भवणविमाण ३६. अणेगलक्खणपसत्थसुविभत्तचित्तकरचरणदेसभाए, उड्ढामुहलोमजालसुकुमालणिद्धमउआवत्तपसत्थलोमविरइयसिरिवच्छच्छण्णविउलवच्छे, देसखेत्तसुविभत्तदेहधारी, तरुणरविरस्सिबोहियवरकमलविबुद्धगब्भवण्णे, हयपोसणकोससण्णिभपसत्थपिठ्ठतणिरुवलेवे, पउमुप्पलकुन्दजाइजुहियवरचंपगणागपुप्फसारंगतुल्लगंधी छत्तीसाहियपसत्थपत्थिवगुणेहिं जुत्ते, अव्वोच्छिण्णायवत्ते, पागड उभयजोणी, विसुद्धणियगकुलगयणपुण्णचंदे, चंदे इव सोमयाए णयणमणणिव्वइकरे, अक्खोभे सागरो व थिमि, धणवइव्व भोगसमुदयसद्दव्वयाए, समरे अपराइए, परमविक्कमगुणे, अमरवइसमाणसरिसरूवे, मणुयवई भरहचक्कवट्टी भरहं भुञ्जइ पणट्ठसत्तू । [५२] वहाँ विनीता राजधानी में भरत नामक चातुरंत चक्रवर्ती - पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण तीन ओर समुद्र एवं उत्तर में हिमवान् - यों चारों ओर विस्तृत विशाल राज्य का अधिपति राजा उत्पन्न हुआ। वह महाहिमवान् पर्वत के समान महत्ता तथा मलय, मेरु एवं महेन्द्र (संज्ञक पर्वतों) के सदृश प्रधानता या विशिष्टता लिये हुए था। वह अत्यन्त विशुद्ध-दोष रहित, चिरकालीन - प्राचीन वंश में उत्पन्न हुआ था । उसके अंग पूर्णत: राजोचित लक्षणों से सुशोभित थे । वह बहुत लोगों द्वारा अति सम्मानित और पूजित था, सर्वगुणसमुद्ध - सब गुणों से शोभित क्षत्रिय था - जनता को आक्रमण तथा संकट से बचाने वाला था, वह सदा
SR No.003460
Book TitleAgam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1986
Total Pages482
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, & agam_jambudwipapragnapti
File Size10 MB
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