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________________ चतुर्थ प्राभृत ] [ ४७ अंतो अंकमुहसंठिया, बाहिं सत्थियमुहसंठिया, दुहओ पासेणं तीसे तहेव जाव सव्वबाहिरिया चेव बाहा। __ (क ) तीसे णं सव्वब्भंतरिया बाहा = मंदरपव्वयं तेणं णव जोयणसहस्साई चत्तारि य छलसीए जोयणसए णव य दसभागे जोयणस्स परिक्खेवेणं आहिए त्ति वएजा। प. - ता से णं परिक्खेवविसेसे कओ ? आहिए त्ति वएजा ? उ. - ताजे णं मंदरस्स पव्वयस्स परिक्खेवे तं परिक्खेवं, तिहिं गुणित्ता, दसहिं छित्ता दसहिं भागे हीरमाणे = एस णं परिक्खेव-विसेसे, आहिए त्ति वएजा। __ (ख) तीसे णं सव्वबाहिरिया बाहा = लवण समुदंतेणं, चउणउइं जोयणसहस्साइं, अट्ठ य अट्ठसठे जोयणसए, चत्तारि य दसभागे जोयणस्स परिक्खेवेणं, आहिए त्ति वएज्जा। प. - ता से णं परिक्खेवविसेसे कओ? आहिए त्ति वएज्जा। उ. - ता जे णं जंबूहीव-दीवस्स परिक्खेवे तं परिक्खेवं तिहिं गुणित्ता, दसहिं छेत्ता, दसहिं भागे हीरमाणे = एस णं परिक्खेव-विसेसे, आहिए त्ति वएजा। तावखेत्तस्स अंधकारखेत्तस्स य आयामाईणं परूवणं प. - ता तीसे णं तावक्खेत्ते केवइयं आयामेणं ? आहिए त्ति वएजा। उ. - ता अट्ठत्तरि जोयणसहस्साइं, तिण्णि य तेत्तीसे जोयणसए जोयणतिभागे च आयामेणं, आहिए त्ति वएज्जा। प. - तया णं किंसंठिया अंधकारसंठिई ? आहिय त्ति वएजा। उ. - उद्धीमुह-कलंबुआपुप्फसंठिया तहेव जाव बाहिरिया चेव बाहा। तीसे णं सव्वब्भंतरिया बाहा मंदरपव्वयंतेणं छज्जोयणसहस्साई तिण्णि य चउवीसे जोयणसए छच्च दसभागे जोयणस्स परिक्खेवेणं, आहिय त्ति वएज्जा। प. - ता तीसे णं परिक्खेव विसेसे ? आहिय त्ति वएज्जा। उ. - ता जे णं मंदरस्स पव्वयस्स परिक्खेवे णं तं परिक्खेवं दोहिं गुणेत्ता, दसहिं छित्ता दसहिं भागे हीरमाणे, एस णं परिक्खेव-विसेसे, आहिय त्ति वएज्जा। तीसे णं सव्वबाहिरिया बाहा लवणसमुदं तेणं तेवट्ठि जोयणसहस्साइं दोण्णि य पणयाले जोयसाए छच्च दस भागे जोयणस्स परिक्खेवेणं आहिय त्ति वएज्जा। १. मेरु की परिधि ३१,६,२३ योजन की है, इसे तीन से गुणा करने पर ९४,८,७९ योजन हुए, इनके दश का भाग देने पर ९,८,८६ ९/१० लब्ध होते हैं - यह सर्व आभ्यन्तर बाहा की परिधि है। २. जंबूद्वीप की परिधि ३,१६,२,२७ योजन तीन कोस २८ धनुष १३ अंगुल तथा आधे अंगुल से कुछ अधिक है। इसमें दश का भाग देने पर ९४,८,६८ योजन और एक योजन के दस भागों में से चार भाग जितनी सर्वबाह्य बाहा की परिधि विशेष है।
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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