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________________ तेरहवें प्राभृत में - कृष्ण और शुक्ल पक्ष में चन्द्र की हानि-वृद्धि, ६२ पूर्णिमा तथा ६२ अमावस्याओं में चन्द्रसर्यों के साथ राह का योग, प्रत्येक अयन में चन्द्र की मण्डल-गति आदि का वर्णन किया गया है। चौदहवें प्राभृत में – कृष्ण और शुक्ल पक्ष की ज्योत्सना और अंधकार का प्रमाण वर्णित है। पन्द्रहवें प्राभूत में - चन्द्रादि ज्योतिष्क देवों की एक मुहूर्त की गति है, यह बतलाकर नक्षत्र मास में चन्द्र, सूर्य, ग्रहादि की मण्डल गति और ऋतुमास तथा आदित्यमास में भी मण्डलगति का निरूपण किया है। सोलहवें प्राभृत में – चन्द्रिका, आतप और अन्धकार के पर्यायों का वर्णन है। सत्रहवें प्राभृत में - सूर्य के च्यवन तथा उपपात के संबंध में अन्य २५ मत-मतान्तरों का उल्लेख करने के पश्चात् स्वमत का संस्थापन किया है। अठारहवें प्राभृत में - भूमि सेसूर्य-चन्द्रादि की ऊँचाई का परिमाण बताते हुए अन्य २५ मत-मतान्तरों का उल्लेख करके स्वमत का प्रतिपादन किया है। चन्द्र-सूर्य के विमानों के नीचे, ऊपर तथा सम विभाग में ताराओं के विमान होने के कारण एक चन्द्र का ग्रह, नक्षत्र और ताराओं का परिवार, मेरु पर्वत से ज्योतिष्कचक्र का अन्तर, जम्बूद्वीप में सर्व बाह्य-आभ्यन्तर, ऊपर नीचे चलने वाले नक्षत्र, चन्द्र-सूर्यादि के संस्थान, आयाम, विष्कम्भ और बाहुल्य, उनको वहन करने वालों देवों की संख्या और उनके दिशाक्रम से रूप, शीघ्र-मंद गति, अल्पबहुत्व, चन्द्र-सूर्य की अग्र महिषियों का परिवार, विकुर्वणा, शक्ति एवं देव-देवियों की जघन्स उत्कृष्ट स्थिति आदि विषयों पर विस्तार से विचार हुआ है। उन्नीसवें प्राभृत में – चन्द्र और सूर्य सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं अथवा लोक के एक विभाग को ? यह प्रश्न उठा कर इस संबंध में बारह मत-मतान्तरों का उल्लेख करते हुए स्वमत का निरूपण किया है। साथ ही लवण समुद्र का आयाम, विष्कम्भ और चन्द्र, सूर्य नक्षत्र एवं ताराओं का वर्णन है। उसी प्रकार धातकीखण्ड के संस्थान, कालोदधिसमुद्र और पुष्कारार्ध द्वीप तथा मनुष्य क्षेत्र आदि का विवरण प्रस्तुत हुआ है। इसी प्राभृत में यह भी बतलाया गया है कि - इन्द्र के अभाव में व्यवस्था, इन्द्र का जघन्य और उत्कृष्ट विरहकाल, मनुष्य क्षेत्र के बाहर चन्द्र की उत्पत्ति और गति तथा अन्त में स्वयम्भरमण समुद्र तक द्वीपसमुद्रों के आयाम, विष्कम्भ, परिधि आदि का वर्णन है। बीसवें प्राभृत में - चन्द्रादि का स्वरूप, राहू का वर्णन, राहू के दो प्रकार तथा जघन्य-उत्कृष्ट काल का वर्णन है। यहीं चन्द्र को शशि और सूर्य को आदित्य कहने का कारण बतलाते हुए स्पष्ट किया है कि ज्योतिष्कों के इन्द्र - चन्द्र का मृग (शश) के चिह्न वाला 'मृगाङ्क-विमान' है और सूर्य समय, आवलिका आदि से लेकर अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल का आदिकर्ता है। चन्द्र और सूर्य की अग्रमहिषियों और चन्द्र-सूर्य के कामभोगों की मानवीय कामभोगों के साथ तुलना भी यहाँ प्रस्तुत हुई है तथा अन्त में ८८ ग्रहों के नाम बताये गये हैं। इन प्राभृतों के भी अन्य लघु प्राभृतों के रूप में विभाजन उपर्यक्त विषयों के अवलोकन से सहज ही यह अनुमान किया जा सकता है कि सूर्य-प्रज्ञप्ति के आयाम में न केवल सूर्य और उससे संबद्ध विषयों का ही इसमें विमर्श हुआ है, अपितु समग्र ज्योतिष्क परिवार का प्रसंगानुसार सूक्ष्म एवं स्थूल विमर्श समावृत हो गया है। इतना ही नहीं, यहाँ प्राचीन ज्योतिष-संबंधी मूल मान्यताओं का भी सङ्कलन आ गया है। इसमें चर्चित विषय अन्यान्य धर्मों के मान्य-ग्रन्थों में चर्चित विषयों से भी कुछ अंशों में साम्य रखते हैं। ९. सूर्य-प्रज्ञप्ति की नियुक्ति एवं अन्य विवेचनाएँ __सूर्य-प्रज्ञप्ति के व्यापक विषय-विवेचन से प्रभावित हो कर नियुक्तिकार श्री भद्रबाहु ने दस आगमों पर नियुक्तियों की रचना की थी, उनमें सूर्य-प्रज्ञप्ति भी थी। किन्तु दुर्भाग्य से वह अब अनुपलब्ध है। किन्तु आचार्य मलयगिरि की वृत्ति [ ३६ ]
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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