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________________ अपना विशिष्ट स्थान रखती है। इसकी रचना में १०८ गद्य-सूत्र और १०३ पद्य-गाथाएं प्रयुक्त हैं। इसमें एक अध्ययन, २० प्राभृत और उपलब्ध मूल पाठ २२०० श्लोक परिमाण है। __ 'सूर्य-प्रज्ञप्ति' अति प्राचीन ग्रन्थ है, क्योंकि इसका उल्लेख श्वेताम्बर, दिगम्बर और स्थानकवासी – तीनों में मान्य रहा है। इसी दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि इसकी स्थिति तीनों के विभाजन से पूर्व थी। इसका समय विक्रम पूर्व का होना चाहिये। विषय विस्तार की दृष्टि से इसके २० प्राभृतों में खगोल शास्त्र की जितनी सूक्ष्म विचारणाएँ प्रस्तुत हुई हैं, उतनी अन्यत्र कहीं एक साथ प्रस्तुत नहीं हुई हैं। इसका उपक्रम मिथिला नगरी में जितशत्रु के राज्य में नगर से बाहर मणिभद्र चैत्य में वर्धमान महावीर के पधारने पर धर्मोपदेश के पश्चात् गणधर गौतम की जिज्ञासा के समाधान हेतु हुआ है। इसमें - 'मंडलगतिसंख्या, सूर्य का तिर्यक् परिभ्रमण, प्रकाश्य क्षेत्र परिमाण, प्रकाश संस्थान, लेश्या प्रतिघात, ओजः संस्थिति, सूर्यावरक उदय संस्थिति, पौरुषी छायाप्रमाण, योग स्वरूप, संवत्सरों के आदि और अंत, संवत्सर के भेद, चन्द्र की वृद्धि अपवृद्धि, ज्योत्स्ना प्रमाण, शीघ्रगति निर्णय, ज्योत्स्ना लक्षण, च्यवन और उपपात, चन्द्र सूर्य आदि की ऊंचाई, उनका परिमाण एवं चन्द्रादि के अनुभाव आदि' विषयों की विस्तृत चर्चा है। अतः यह ग्रन्थ खगोलशास्त्र के चिन्तकों के लिये पर्याप्त उपयोगी तथ्य उपस्थापित करता है। उपाचार्य श्री देवेन्द्र मुनि शास्त्री ने अपने महनीय ग्रन्थ 'जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा' में सूर्यप्रज्ञप्ति का विस्तृत परिचय देते हुये लिखा है। सारांश इस प्रकार है - प्रथम प्राभृत में – 'दिन व रात्रि में ३० मुहूर्त, नक्षत्रमास, सूर्यमास, चन्द्रमास और ऋतुमास के मुहूर्तों की वृद्धि, प्रथम से अंतिम और अंतिम से प्रथम मंडल पर्यन्त सूर्य की गति के काल का प्रतिपादन एवं अंतिम मंडल में सूर्य की एक बार तथा शेष मंडलों में सूर्य की दो बार गति होना, आदित्य-संवत्सर के दक्षिणायन और उत्तरायन में अहोरात्र के जघन्य तथा उत्कृष्ट मुहूर्त एवं अहोरात्र के मुहूर्तों की हानिवृद्धि के कारण भरत और ऐरावत क्षेत्र के सूर्य का उद्योत क्षेत्र, आदित्य संवत्सर के दोनों अयनों में प्रथम से अंतिम और अंतिम से प्रथम पर्यन्त एक सूर्य की गति का अंतर, अंतर के संबंध में छह अन्य मान्यताएँ, सूर्य द्वारा द्वीप समुद्रों के अवगाहन संबंध में एक अहोरात्र में सूर्य के परिभ्रमण का परिमाण एवं मंडलों की रचना तथा विस्तार वर्णित है।' द्वितीय प्राभृत में – 'सूर्य के उदय और अस्त का वर्णन करके अन्य तीर्थकों के मतों का उल्लेख किया है, जिसमें - १. सूर्य का पूर्व दिशा में उदित होकर आकाश में चला जाना, २. सूर्य को गोलाकार किरणों का समूह बतलाकर संध्या में नष्ट होना, ३. सूर्य को देवता बतलाकर उसका स्वभाव में उदयास्त होना, ४. सूर्य के देव होने से उसकी सनातन स्थिति रहना, ५. प्रात: पूर्व दिशा में उदित होकर सायं पश्चिम में पहुंचना तथा वहां से अधोलोक को प्रकाशित करते हुये नीचे की ओर लौट जाना आदि प्रमुख हैं। अंत में सूर्य के एक मंडल से दूसरे मंडल में गमन का और वह एक मुहूर्त में कितने क्षेत्र में परिभ्रमण करता है ? इसका विचार व्यक्त करते हुये स्वमत का भी प्रतिपादन हुआ है। अन्य धर्मावलम्बी पृथ्वी का आकर गोल मानते हैं किन्तु जैन धर्म की मान्यता उससे भिन्न है, यह भी इससे संकेतित है।' तृतीय प्राभृत में – चन्द्र, सूर्य द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले द्वीप एवं समुद्रों का वर्णन है। इसी प्रसंग में बारह [ ३४ ]
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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