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________________ नवम प्राभृत ] [ ७१ नो चेव णं लेसं अभिवड्ढेमाणे वा, निव्वुड्ढेमाणे वा।' प. ता कइकट्ठे ते सूरिए पोरिसिच्छायं निव्वत्तेइ ? आहिए त्ति वएजा। उ. तत्थ इमाओ छण्णउइ पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ, तं जहा - तत्थेगे एवमाहंसु - १. ता अस्थि णं से देसे जंसि णं देसंसि सूरिए एगपोरिसियं छायं निव्वत्तेइ, एगे एवमाहंसु, एगे पुण एवमाहंसु - २. ता अस्थि णं से देसे जंसि णं देसंसि सूरिए दु-पोरिसियं छायं निव्वत्तेइ, एगे एवमाहंसु, एवं एएणं अभिलावेणं णेयव्वं, जाव (३-९५) एगे पुण एवमाहंसु - ९६ - ता अस्थि णं से देसे जंसि णं देसंसि सूरिए छण्णउइ पोरिसियं छायं निव्वत्तेइ, एगे एवमाहंसु, तत्थ जे ते एवमाहंसु - १. ता अत्थि णं से देसे जंसि णं देसंसि सूरिए एग-पोरिसियं छायं निव्वत्तेइ 'त्ति' ते एवमाहंसु, ता सूरियस्स णं सव्वहेट्ठिमाओ सूर-प्पडिहीओ बहित्ता अभिणिसट्टाहिं लेसाहिं ताडिजमाणीहिं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिजाओ भूमिभागाओ जावइयं सूरिए उड्ढं उच्चत्तेणं, एवइयाए एगाए अद्धाए, एगेणं छायाणुमाणप्पमाणेणं उमाए, तत्थ से सूरिए एगपोरिसीयं छायं निव्वत्तेइ त्ति, तत्थ जे वे एवमाहंसु - २. ता अत्थि णं से देसे जंसि णं देसंसि सूरिए दु-चोरिसिपं छायं निव्वत्तेइ 'त्ति' ते एवमाहंसु, ता सूरियस्स णं सव्वहेट्ठिमाओ सूर-प्पडिहीओ बहित्ता अभिणिसट्टाहिं लेसाहिं ताडिजमाणीहिं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिजाओ भूमिभागाओ जावइयं सूरिए उड्ढे उच्चत्तेणं, एवइयाई दोहिं अद्धाहिं, दोहिं छायाणुमाणप्पमाणोहिं उमाए, एत्थ णं से सूरिए दुपोरिसीयं छायं निव्वत्तेइ त्ति, ___ ३.९५ - एवं एएणं अभिलावेणं णेयव्व, जाव .... १. इसके अनन्तर यहाँ स्वमत सूचक 'वयं पुण एवं वयामो' यह वाक्य नहीं है और न स्वमत का कथन ही है। तदेवं परतीर्थिक-प्रतिपत्तिद्वयं श्रुत्वा भगवान् गौतमः, स्वमतं पृच्छति, ता कट्ठइ कमित्यादि - सूर्य. टीका टीकाकार का यह कथन सूर्यप्रज्ञप्ति की संकलनशैली के अनुरूप नहीं है - क्योंकि प्रतिपत्तियों के कथन के अनन्तर 'वयं पण एवं वयामो' इस वाक्य से ही सर्वत्र स्वमत का प्रतिपादन किया गया है। २. तत्र-तेषां षण्णवते : परतीर्थिकानां मध्ये, एके एवमाहुः, 'ता' इति पूर्ववत् अस्ति स देशो, यस्मिन् देशे सूर्यः आगत:सन् एकपौरुपी-एकपुरुपप्रमाणां (पुरुपग्रहणमुपलक्षणं सर्वस्यापि प्रकाश्यवस्तुनः स्व-प्रमाणां) छायां निर्वर्तयति। - सूर्य. टीका.
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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