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________________ ५४ ] [ सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र २२. ता अणुसागरोवम-सयमेव सूरियस्स ओया अण्णा उप्पज्जइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु। एगे पुण एवमाहंसु - २३. ता अणुसागरोवम-सहस्समेव सूरियस्स ओया अण्णा उप्पजइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु। एगे पुण एवमाहंसु - २४. ता अणुसागरोवम-सयसहस्समेव सूरियस्स ओया अण्णा उप्पजइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु। एगे पुण एवमाहंसु - २५. ता अणुउस्सप्पिणि-ओसप्पिणिमेव सूरियस्स ओया अण्णा उप्पजइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु। वयं पुण एवं वयामो - (क) ता तीसं तीसं मुहुत्ते सूरियस्स ओया अवट्ठिया भवइ तेण परं सूरियस्स ओया अणवट्ठिया भवइ। (ख) छम्मासे सूरिए ओयं णिव्वुड्ढेइ। ___ छम्मासे सूरिए ओयं अभिवुड्ढेइ। (ग) निक्खममाणे सूरिए देसं णिव्वुड्ढेइ। पविसमाणे सूरिए देसं अभिवुड्ढेइ। प. - तत्थ को हेऊ ? आहिए त्ति वएज्जा। उ. - ता अयं णं जंबुद्दीवे दीवे सव्वदीव-समुद्दाणं सव्वब्भंतराए सव्व खुड्डागे वट्टे जाव जोयणसयसहस्समायाम-विक्खंभेणं तिण्णि जोयणसयसहस्साइं, दोण्णि य सत्तावीसे जोयणसए, तिण्णि कोसे, अट्ठावीसं च धणुसयं, तेरस य अंगुलाई अद्धंगुलं च किंचि विसेसाहिए परिक्खेवे णं पण्णत्ते। १. ता जया णं सूरिए सव्वब्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं उत्तमकट्ठपत्ते उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, जहणिया दुवालसमुहुत्ता राई भवइ। २. से निक्खममाणे सूरिए णवं संवच्छरं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तंसि अभिंतराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ। १. इन प्रतिपत्तियों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैनागमों के अतिरिक्त अन्य दार्शनिक पुराणादि ग्रन्थों में भी औपमिककालवाचक 'पल्योपम-सागरोपम, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी' आदि शब्दों का प्रयोग था। वर्तमान में भी यदि पुराणादि ग्रन्थों इन औपमिककाल वाचक शब्दों का कहीं प्रयोग हो तो अन्वेषणशील विद्वान् प्रयत्न करके प्रकाशित करें।
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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