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________________ चौदहवाँ कषायपद] [ १४९ कषाय से ही कर्मों का आदान - तत्त्वार्थसूत्र में बताया है- 'सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते'-कषाययुक्त होकर जीव कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है । दशवैकालिक सूत्र में भी कहा है - ये चारों कषाय पुनर्भव के मूल का सिंचन करते हैं।' चौवीस दण्डकों में कषाय की प्ररूपणा ९५९. णेरइयाणं भंते ! कति कसाया पण्णत्ता ? गोयमा ! चत्तारि कसाया पण्णत्ता । तं जहा - कोहकसाए जाव लोभकसाए । एवं जाव वेमाणियाणं । [९५९ प्र.] भगवान् ! नैरयिक जीवों में कितने कषाय होते हैं ? [९५९ उ.] गौतम ! उनमें चार कषाय होते हैं । वे इस प्रकार हैं - क्रोघकषाय से (लेकर) लोभकषाय तक । इसी प्रकार वैमानिक तक (चौवीस दण्डकवर्ती जीवों में चारों कषाय पाए जाते हैं ।) विवेचन - चौवीस दण्डकवर्ती जीवों में कषायों की प्ररूपणा - प्रस्तुत सूत्र (९५९) में नैरयिकों वे वैमानिकों तक समस्त संसारी जीवों में इन चारों कषायों का सद्भाव बताया है । कषायों के प्रतिष्ठान की प्ररूपणा ९६० [१] कतिपतिट्ठिए णं भंते ! कोहे पण्णत्ते ? गोयमा ! चउपतिट्ठिए कोहे पण्णत्ते । तं जहा-आयपतिट्ठिए १ परपतिट्ठिए २ तदुभयपतिट्ठिए ३ अप्पतिट्ठिए ४ । [९६०-१ प्र.] भगवन् ! क्रोध कितनों पर प्रतिष्ठित (आश्रित है ?) (अर्थात्-किस-किस आधार पर रहा हुआ है ?) [९६०-१ उ.] गौतम ! क्रोध को चार (निमित्तों) पर प्रतिष्ठित (आधारित) कहा है । वह इस प्रकार-(१) आत्मप्रतिष्ठित, (२) परप्रतिष्ठित, (३) उभय-प्रतिष्ठित और (४)अप्रतिष्ठित । [२] एवं णेरइयादीणं जाव वेमाणियाणं दंडओ । [९६०-२] इसी प्रकार नैरयिकों से लेकर वैमानिकों तक (चौवीस दण्डकवर्ती जीवों ) के विषय में दण्डक (आलापक कहना चाहिए ।) [३] एवं माणेणं दंडओ, मायाए दंडओ, लोभेणं दंडओ । । १. (क) तत्त्वार्थसूत्र अ. ९, सू. २ (ख) 'चत्तारि एए कसिणा कसाया, सिंचंति मूलाई पुणब्भवस्स ।' - दशवैकालिकसूत्र अ.९
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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