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________________ १२८ ] [प्रज्ञापनासूत्र _[९२४] वैमानिकों (के बद्ध-मुक्त शरीरों) की प्ररूपणा भी इसी तरह (समझनी चाहिए।) विशेषता यह है कि उन श्रेणियों की विष्कम्भसूची तृतीय वर्गमूल से गुणित अंगुल के द्वितीय वर्गमूल प्रमाण है अथवा अंगुल के तृतीय वर्गमूल के घन के बराबर श्रेणियां हैं। शेष सब पूर्वोक्त कथन के समान समझना चाहिए । विवेचन - वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के बद्ध-मुक्त शरीरों की प्ररूपणा - प्रस्तुत तीन सूत्रों (९२२ से ९२४ तक) में क्रमश: वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के बद्ध-मुक्त शरीरों की प्ररूपणा की गई है। व्यन्तरदेवों के बद्ध-मुक्त शरीरों को प्ररूपणा - व्यन्तरदेवों के बद्ध-मुक्त औदरिकशरीरों के विषय में नैरयिकों के बद्ध-मुक्त औदारिकशरीरों की तरह समझना चाहिए। व्यन्तरों के बद्ध वैक्रिय शरीर नारकों की तरह असंख्यात हैं। काल की अपेक्षा से एक-एक समय मे एक-एक शरीर का अपहार करने पर असंख्यात उत्सर्पिणी और असंख्यात अवसर्पिणी कालों में वाणव्यन्तरों के समस्त बद्धवैक्रियशरीरों का अपह क्षेत्र की अपेक्षा से वे असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं । अर्थात्- असंख्यात श्रेणियों में जितने आकाशप्रदेश होते हैं, उतने ही वे शरीर हैं। वे श्रेणियाँ प्रतर के असंख्यात भाग हैं। केवल उनकी सूची में कुछ विशेषता (अन्तर) है। उन असंख्यात श्रेणियों की विष्कम्भसूची (विस्तार सूची) इस प्रकार है। जैसे महादण्डक में पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च नपुंसकों से व्यन्तरदेव असंख्यातगुणहीन कहे हैं, वैसे ही इनकी (व्यन्तरदेवों की) विष्कम्भसूची भी तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों की विष्कम्भसूची से असंख्यातगुणहीन कहनी चाहिए। प्रतर के पूरण और अपहरण में वह सूची संख्यातयोजनशतवर्ग प्रतिभाग (खण्ड) प्रमाण है। तात्पर्य यह है कि असंख्यात योजन शतवर्गप्रमाण श्रेणिखण्ड में यदि एक-एक व्यन्तर की स्थापना की जाए तो वे सम्पूर्ण प्रतर को पूर्ण करते हैं, अथवा यदि एक-एक व्यन्तर के अपहार में एक-एक संख्यात-योजनशतवर्गप्रमाण श्रेणिखण्ड का अपहरण होता है, तब सभी मिलकर व्यन्तर पूर्ण होते हैं, उससे पर सकल प्रतर है। वाणव्यन्तरों के मुक्त वैक्रियशरीरों का कथन मुक्त औधिक वैक्रियशरीरवत् समझना चाहिए। बद्धमुक्त आहारक शरीरों का कथन नैरयिकों के बद्ध-मुक्त आहारकशरीरवत् समझना चाहिए। इनके बद्ध तैजसकार्मणशरीरों का कथन इन्हीं के बद्ध वैक्रियशरीरवत् समझना चाहिए। मुक्त तैजस-कार्मण शरीरों के विषय में औधिक मुक्त तैजस-कार्मणशरीर के समान समझना चाहिए । ज्योतिष्कदेवों के बद्ध-मुक्त शरीरों की प्ररूपणा - इनके बद्ध-मुक्त औदारिकशरीरों का कथन नैरयिकवत् समझना चाहिए। बद्ध वैक्रियशरीर असंख्यात हैं। काल की अपेक्षा से मार्गणा करने पर एक समय में एक-एक शरीर का अपहरण करने पर असंख्यात-उत्सर्पिणी-अवसर्पिणीकालों में उनका सम्पूर्णरूप से अपहार होता है। क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात श्रेणियाँ हैं, वे श्रेणियाँ प्रतर के असंख्यातभाग प्रमाण जाननी चाहिए। विशेष यह है कि उन श्रेणियों की विष्कम्भसूची व्यन्तरों की विष्कम्भसूची से संख्यातगुणी अधिक होती है, क्योंकि महादण्डक में व्यन्तरों से ज्योतिष्कदेव संख्यातगुणे अधिक बताए गए हैं। इसलिए प्रतिभाग के विषय में भी विशेष स्पष्टतया कहते हैं- उन श्रेणियों की विष्कम्भसूची २५६ वर्ग प्रमाणखण्डरूप प्रतर के
SR No.003457
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1984
Total Pages545
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size11 MB
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