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________________ ५१०] [प्रज्ञापना सूत्र विशेषतया अकर्मभूमिज, अन्तीपज और असंख्यात वर्षायुष्क मनुष्यों में भी ये उत्पन्न होते हैं, यह कहना चाहिए। [७] जति देवेसु उववजंति किं भवणवतीसु उववजंति ? जाव किं वेमाणिएसु उववजंति ? गोयमा! सव्वेसु चेव उववति। [६७२-७ प्र.] (भगवन् !) यदि (वे) देवों में उत्पन्न होते हैं तो क्या भवनपति देवों में उत्पन्न होते हैं ? (अथवा) यावत् वैमानिक में भी उत्पन्न होते हैं ? [६७२-७ उ.] गौतम! (वे) सभी (प्रकार के) देवों में उत्पन्न होते हैं। [८] जति भवणवतीसु उववज्जति किं असुरकुमारेसु उववजंति ? जाव थणियकुमारेसु उववजंति ? गोयमा! सव्वेसु चेव उववजंति। [६७२-८ प्र.] (भगवन्!) यदि (वे) भवनपति देवों में उत्पन्न होते हैं तो क्या असुरकुमारों में उत्पन्न होते हैं? (अथवा) यावत् स्तनित्कुमारों में उत्पन्न होते हैं? [६७२-८ उ.] गौतम! (वे) सभी (भवनपतियों ) में उत्पन्न होते हैं। ... [९] एवं वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिएसु निरंतरं उववजंति जाव सहस्सारो कप्पो त्ति। [६७२-९] इसी प्रकार वाणव्यन्तरों, ज्योतिष्कों और सहस्नारकल्प तक के वैमानिक देवों में निरन्तर उत्पन्न होते हैं। ६७३. [१] मणुस्सा णं भंते ! अणंतरं उव्वट्टित्ता कहिं गच्छंति ? कहिं उववजंति ? किं नेरइएसु उववज्जति जाव देवेसु उववजंति ? . गोयमा! नेरइएसु वि उववजंति जाव देवेसु वि उववति । [६७३-१ प्र.] (भगवन्!) मनुष्य अनन्तर उद्वर्तन करके कहाँ जाते हैं, कहाँ उत्पन्न होते हैं ? क्या वे नैरयिकों में उत्पन्न होते हैं ? (अथवा) यावत् देवों में भी उत्पन्न होते हैं ? । [६७३-१ उ.] गौतम ! (वे) नैरयिकों में भी उत्पन्न होते हैं, यावत् देवों में भी उत्पन्न होते हैं। [२] एवं निरंतरं सव्वेसु ठाणेसु पुच्छा।। गोयमा! सव्वेसु ठाणेसु उववजंति, णं कहिंचि पडिसेहो कायव्वो जाव सव्वट्ठसिद्धदेवेसु वि उववजंति, अत्यंगतिया सिझंति बुझंति मुच्चंति परिणिव्वायंति सव्वदुक्खाणं अंतं करेंति। [६७३-२ प्र.] भगवन् ! क्या (मनुष्य) नैरयिक आदि सभी स्थानों में उत्पन्न होते हैं ? [६७३-२ उ.] गौतम! वे (इन) सभी स्थानों में उत्पन्न होते हैं, कहीं भी इनके उत्पन्न होने का निषेध नहीं करना चाहिए; यावत् सर्वार्थसिद्ध देवों तक में भी (मनुष्य) उत्पन्न होते हैं और कई मनुष्य
SR No.003456
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 01 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages572
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_pragyapana
File Size12 MB
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