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________________ इसका उल्लेख है। वृत्तिकार आचार्य मलयगिरि ने इसे तृतीय अंग स्थानांग का उपांग कहा है। इस आगम की महत्ता बताते हुए वे कहते हैं कि यह जीवाजीवाभिगम नामक उपांग राग रूपी विष को उतारने के लिए श्रेष्ठ मंत्र के समान है। द्वेष रूपी आग को शान्त करने हेतु जलपूर के समान है। अज्ञान-तिमिर को नष्ट करने के लिये सूर्य के समान है। संसाररूपी समुद्र को तिरने के लिए सेतु के समान है। बहुत प्रयत्न द्वारा ज्ञेय है एवं मोक्ष को प्राप्त कराने की अमोघ शक्ति से युक्त है। वृत्तिकार के उक्त विशेषणों से प्रस्तुत आगम का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। प्रस्तुत आगम के प्रथम सुत्र में इसके प्रज्ञापक के रूप में स्थविर भगवंतों का उल्लेख करते हुए कहा गया है-'उन स्थविर भगवंतों ने तीर्थंकर प्ररूपित तत्त्वों का अपनी विशिष्ट प्रज्ञा द्वारा पर्यालोचन करके, उस पर अपनी प्रगाढ श्रद्धा, प्रीति, रुचि, प्रतीति एवं गहरा विश्वास करके जीव और अजीव सम्बन्धी अध्ययन का प्ररूपण किया उक्त कथन द्वारा यह अभिव्यक्त किया गया है कि प्रस्तुत आगम के प्रणेता स्थविर भगवंत हैं। उन स्थविरों ने जो कुछ कहा है वह जिनेश्वर देवों द्वारा कहा गया ही है, उनके द्वारा अनुमत है, उनके द्वारा प्रणीत है, उनके द्वारा प्ररूपित है, उनके द्वारा आख्यात है, उनके द्वारा आचीर्ण है, उनके द्वारा प्रज्ञप्त है, उनके द्वारा उपदिष्ट है, यह पथ्यान्न की तरह प्रशस्त और हितावह है तथा परम्परा से जिनत्व की प्राप्ति कराने वाला है। यह आगम शब्दरूप से स्थविर भगवंतों द्वारा कथित है किन्तु अर्थरूप से तीर्थंकरों द्वारा उपदिष्ट होने से द्वादशांगी की तरह ही प्रमाणभूत है। इस प्रकार प्रस्तुत आगम की प्रामाणिकता प्रकट की गई है। अंगश्रुतों के अनुकूल होने से ही उपांगश्रुतों की प्रमाणिकता श्रुत की पुरुष के रूप में कल्पना की गई। जिस प्रकार पुरुष के अंग-उपांग होते हैं, उसी तरह श्रुत-पुरुष के भी बारह अंग और बारह उपांगों की कल्पना को स्वीकार किया गया। पुरुष के दो पाँव, दो जंघा, दो उरु, देह का अग्रवर्ती तथा पृष्ठवर्ती भाग (छाती और पीठ), दो बाह, ग्रीवा और मस्तक-ये बारह अंग माने गये हैं। इसी तरह श्रुत-पुरुष, के आचारांग आदि बारह अंग हैं । अंगों के सहायक के रूप में उपांग होते हैं, उसी तरह अंगश्रुत के सहायक-पूरक के रूप में उपांग श्रुत की प्रतिष्ठापना की गई। बारह अंगों के बारह उपांग मान्य किये गये। वैदिक परम्परा में भी वेदों के सहायक या पूरक के रूप में वेदांगों एवं उपांगों को मान्यता दी गई है जो शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा कल्प के नाम से प्रसिद्ध हैं, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्रों की उपांग के रूप में स्वीकृति हुई। अंगों और उपांगों के विषय-निरूपण में सामंजस्य अपेक्षित है जो स्पष्टतः प्रतीत नहीं होता है। यह विषय विज्ञों के लिए अवश्य विचारणीय है। नामकरण एवं परिचय प्रस्तुत सूत्र का नाम जीवाजीवाभिगम है परन्तु अजीव का संक्षेप दृष्टि से तथा जीव का विस्तृत रूप से प्रतिपादन होने के कारण यह 'जीवाभिगम नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् महावीर और गणधर गौतम के प्रश्नोत्तर १. अतो यदस्ति स्थाननाम्नो रागविषपरममंत्ररूपं द्वेषानलसलिलपूरोपमं तिमिरादित्यभूतं भवाब्धिपरमसेतुर्महाप्रयत्नगम्यं निःश्रेयसावाप्यवन्ध्यशक्तिकं जीवाजीवाभिगमनामकमुपाङ्गम्। -मलयगिरि वृत्ति . २. इह खलु जिणमयं जिणाणुमयं, जिणाणुलोमं जिणप्पणीयं जिणपरूवियं जिणक्खायं जिणाणुचिण्णं जिणपण्णत्तं जिणदेसियं जिणपसत्थं अणुव्वीइय तं सद्दहमाणा तं पत्तियमाणा तं रोयमाणा थेरा भगवंतो जीवाजीवाभिगमणामण्झयणं पण्णवइंस। -जीवा. सूत्र १ [१५]
SR No.003454
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Part 01 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages498
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_jivajivabhigam
File Size11 MB
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