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________________ ४६ अनुत्तरोपपातिकदशा बाहर जनपदों में विहार किया। ग्यारह अङ्गों का अध्ययन किया। संयम तथा तप से आत्मा को भावित कर विचरण करने लगा। अनन्तर वह सुनक्षत्र मुनि उस उदार तप से स्कन्दक की तरह कृश हो गया। विवेचन यहाँ से सूत्रकार तीसरे वर्ग के शेष अध्ययनों का वर्णन करते हैं । इस सूत्र में सुनक्षत्र अनगार का वर्णन किया गया है। सूत्र का अर्थ मूलपाठ से ही स्पष्ट है। उदाहरण के लिए सूत्रकार ने थावच्चापुत्र और धन्य अनगार को लिया है। पाठकों को थावच्चापुत्र के विषय में जानने के लिए 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' के पांचवें अध्ययन का अध्ययन करना चाहिए। धन्य अनगार का वर्णन इसी वर्ग के प्रथम अध्ययन में आ चुका है। ___ इस सूत्र में प्रारम्भ में "उक्खेवओ-उत्क्षेपः" पद आया है। उसका तात्पर्य यह है कि इसके साथ के पाठ का पिछले सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए अर्थात् उसके स्थान पर निम्नलिखित पाठ पढ़ना चाहिए जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते नवमस्स णं भंते ! अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स वितियस्स अज्झयणस्स के अढे पण्णत्ते ? इस प्रकार का पाठ प्रायः प्रत्येक अध्ययन के प्रारम्भ में आता है। इसे 'उक्खेवओ या उत्क्षेप' कहते हैं, जिसका आशय है भूमिका या प्रारम्भ। पाठ को संक्षिप्त करने के लिए यहाँ 'उक्खेवओ' पद दे दिया जाता है। दूसरे सूत्रों में भी इसी शैली का अनुसरण किया गया है। जिस प्रकार श्रमण भगवान् महावीर के पास दीक्षित होकर धन्य अनगार ने पारणा के दिन ही आचाम्लव्रत धारण किया था इसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार ने भी किया। जिस प्रकार 'व्याख्याप्रज्ञप्ति' के द्वितीय शतक में स्कन्दक अनगार ने श्रमण भगवान् के पास दीक्षित होकर तप द्वारा अपना शरीर कृश किया था, उसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार का शरीर भी तप से कृश हो गया। इस सूत्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब कोई अपना समीचीन लक्ष्य स्थिर कर ले तो उसकी प्राप्ति के लिए उसको सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए और दृढ़ संकल्प कर लेना चाहिए कि वह उस पद की प्राप्ति करने में बड़े से बड़े कष्ट को भी तुच्छ समझेगा और अपने प्रयत्न में कोई भी शिथिलता नहीं आने देगा। जब तक कोई ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं करता तब तक वह लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। किन्तु जो अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए एकाग्र चित्त से प्रयत्न करता है वह अवश्य और शीघ्र सफलता प्राप्त कर लेता है। २० तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे, गुणसिलए चेइए। सेणिए राया।सामी समोसढे। परिसा निग्गया।राया निग्गओ।धम्मकहा। राया पडिगहो। परिसा पडिगया। तएणं तस्स सुणक्खत्तस्स अण्णया कयाइ पुव्यरत्तावरत्तकालसमयंसि धम्म-जागरियं जहा खंदयस्स। बहु वासा परियाओ। गोयम-पुच्छा। तहेव कहेइ जाव सव्वट्ठसिद्धे विमाणे देवत्ताए उववण्णे। तेत्तीसं सागरोवमाई ठिई। से णं भंते ! जाव महाविदेहे सिज्झिहिइ। उस काल और उस समय में राजगृह नाम का एक नगर था। गुणशिलक नामक चैत्य था। श्रेणिक राजा था। भगवान् महावीर पधारे। परिषदा निकली। राजा भी निकला। धर्मकथा हुई। राजा वापिस चला गया। परिषदा भी
SR No.003449
Book TitleAgam 09 Ang 09 Anuttaropapatik Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages134
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Principle, & agam_anuttaropapatikdasha
File Size3 MB
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