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अनुत्तरौपपातिकदशा
रुचिकर लगा।
तब धन्यकुमार ने दूसरी और तीसरी बार भी अपने माता-पिता से इसी प्रकार कहा, साथ ही कहा कि हे माता-पिता ! मैं संसार के भय से उद्विग्न हुआ हूँ, जन्म, जरा और मरण से भयभीत हुआ हूँ। अतः हे माता-पिता ! मैं आपकी आज्ञा होने पर श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के निकट मुण्डित होकर, गृहवास का त्याग करके अनगार-धर्म स्वीकार करना चाहता हूँ। प्रव्रज्या-सम्मति
५-तए णं साधण्णस्स कुमारस्समाया तं अणिटुं, अकंतं, अप्पियं अमणुण्णं अमणामं, असुयपुव्वं गिरं सोच्चा मुच्छिया। वुत्तपडिवुत्तया जहा महब्बले।[रोयमाणी] कंदमाणी, सोयमाणी, विलवमाणी जाव[धण्णं कुमारं एवं वयासी तुमं सिणं जाया ! अम्हं एगे पुत्ते इटे, कंते, पिए, मण्णुणे, मणामे, थेजे, वेसासिए, सम्मए, बहुमए, अणुमए, भंडकरंडगसमाणे रयणे रयणभूए, जीवियउस्सासे हिययणंदिजणणे उंबरपुष्फमिव दुल्लहे सवणयाए किमंग ! पुण पासणयाए ! तं णो खलु जाया ! अम्हे इच्छामो तुब्भं खणमवि विप्पओगं सहित्तए, तं अच्छाहि ताव जाया ! जाव ताव अम्हे जीवामो, तओ पच्छा अम्हेहिं कालगएहिं समाणेहिं परिणयवये, वड्डियकुलवंसतंतुकजम्मिणिरवयक्खे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतियं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइहिसि।
तए णं धण्णे कुमारे अम्मा-पियरो एवं वयासी तहेव णं तं अम्मयाओ ! जं णं तुब्भे ममं एवं वयह, तुमं सिणं जाया ! अम्हं एगे पुत्ते इढे कंते चेव, जाव पव्वइहिसि; एवं खलु अम्मयाओ ! माणुस्सए भवे अणेगजाइ-जरा-मरण-रोग-सारीरमाणसपकामदुक्ख-वेयण-वसण-सओवद्दवाभिभूए, अधुवे, अणिइए, असासए संज्झब्भरागसरिसे, जलबुब्बुयसमाणे, कुसग्गजलबिंदुसण्णिभे,सुविणगदसणोवमे, विजुलयाचंचले, अणिच्चे, सडणपडणविद्धंसणधम्मे, पुट्विं वा पच्छा वा अवस्स विप्पजहियव्वे भविस्सइ, से केस णं जाणइ अम्मयाओ ! के पुट्विं गमणयाए, के पच्छा गमणयाए? तं इच्छामि णं अम्मयाओ ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे समणस्स जाव-पव्वइत्तए।
तए णं तं धण्णं कुमारं भद्दा सत्थवाही जाहे णो संचाएइ जाव जियसत्तुं आपुच्छइ, इच्छामि णं देवाणुप्पिया! धण्णस्स दारयस्स णिक्खममाणस्स छत्त-मउड-चामराओ य विदिनाओ।
तए णं जियसत्तू राया भई सत्थवाहिं एवं वयासी—अच्छाहि णं तुम देवाणुप्पिए ! सुनिवृत्तवीसत्था, अहण्णं सयमेव धण्णस्स दारयस्स निक्खमणसक्कारं करिस्सामि।
सयमेव जितसत्तू निक्खमणं करेइ, जहा थावच्चापुत्तस्स कण्हो। तए णं धण्णे दारए सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ जाव पव्वइए ।
तए णं धण्णे दारए अणगारे जाए ईरियासमिए जाव गुत्तबंभचारी। ___ धन्यकुमार की माता उसके उपर्युक्त अनिष्ट, अकान्त, अप्रिय, अमनोज्ञ, मन को अप्रिय, अश्रुतपूर्व (जो पहले कभी नहीं सुनी) ऐसी (आघातकारक) वाणी सुनकर, मूर्छित हो गई। तत्पश्चात् होश में आने पर उनका कथन और प्रतिकथन हुआ। वह रोती हुई, आक्रन्दन करती हुई,शोक करती हुई और विलाप करती हुई महाबल के कथन