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________________ प्रथम वर्ग] [१३ सामाइयमाइयाई एक्कारस अंगाइ अहिज्जइ अहिज्जित्ता बहूहिं चउत्थ जाव[छट्ठट्ठम-दसम-दुवालसेहिं मासद्धमासखमणेहिं विविहेहिं तवोकम्मेहिं ] अप्पाणं भावेमाणे विहरइ। तए णं अरहा अरिट्ठनेमी अण्णया कयाइं बारवईओ नयरीओ नंदणवणाओ पडिणिक्खमइ, बहिया जणवयविहारं विहरइ। भिक्षुप्रतिमा तएणं से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइ जेणेव अरहा अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करेत्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी इच्छामिणं भंते! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाएसमाणे मासियं भिक्खपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए। एवं जहा खंदओ तहा बारस भिक्खुपडिमाओ फासेइ। गुणरयणं पि तवोकम्मं तहेव फासेइ निरवसेसं। जहा खंदओ तहा चिंतेइ, तहा आपुच्छइ, तहा थेरेहिं सद्धिं सेत्तुंजं दुरूहइ, बारस' वरिसाइं परियाए मासियाए संलेहणाए जाव[अप्पाणं झोसेइ, झोसित्ता सटुिं भत्ताइं अणसणाए छेदेइ, छेदित्ता जस्सट्टाए कीरइ नग्गभावे मुंडभावे, केसलोए, बंभचेरवासे, अण्हाणगं, अच्छत्तयं, अणुवाहणयं, भूमिसेज्जाओ, फलगसेज्जाओ, परघरप्पवेसे, लद्धावलद्धाइं माणावमाणाइं, परेसिंहीलणाओ, निंदणाओ, खिंसणाओ, तालणाओ, गरहणाओ, उच्चावया विरूवरूवा बावीसं परीसहोवसग्गा-गामकंटगा अहियासिज्जंति तम आराहेइ, चरिमुस्सासेहिं ] सिद्धे-बुद्धे-मुत्ते-परिनिव्वाए-सव्वदुक्खपहीणे। निक्षेप ___ एवं खलु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्स अयमद्वे पण्णत्ते। __ इसके पश्चात् गौतम अनगार ने अन्यदा किसी समय भगवान् अरिष्टनेमि के सान्निध्य में रहने वाले आचार, विचार की उच्चता को पूर्णतया प्राप्त स्थविरों के पास सामायिक से लेकर आचारांगादि ११ अंगों का अध्ययन किया यावत् [अध्ययन करके फिर अनेक उपवास, बेला, तेला, चौला, पचौला, मासखमण, अर्धमासखमण आदि विविध प्रकार के तप से] आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। अरिहंत भगवान् अरिष्टनेमि ने अब द्वारका नगरी के नन्दनवन से विहार कर दिया और वे अन्य जनपदों में विचरण करने लगे। तपस्या और शास्त्र-स्वाध्याय में तत्पर अनगार गौतम अवसर पाकर भगवान् अरिष्टनेमि की सेवा में उपस्थित हुए। विधिपूर्वक वंदना, नमस्कार करने के अनन्तर उन्होंने भगवान् से निवेदन किया "भगवन् ! मेरी इच्छा है.यदि आप आज्ञा दें तो मैं मासिकी भिक्षु-प्रतिमा (प्रतिज्ञा विशेष) की आराधना करूँ।" भगवान् से आज्ञा पाकर वे साधना में लीन हो गए। जैसे स्कन्धक मुनि ने साधना की वैसे ही मुनि गौतमकुमार ने भी बारह भिक्षुप्रतिमाओं का आराधन करके गुणरत्न नामक तप का भी वैसे १. कहीं-कहीं 'मासियाए संलेहणाए वारस वरिसाइं पारियाए' ऐसा पाठ है परन्तु इसमें जाव की पूर्ति बराबर नहीं बैठती अतः उल्लिखित पाठ ही समीचीन प्रतीत होता है। २. वर्ग १, सूत्र २.
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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