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________________ १०] [अन्तकृद्दशा ___ 'बलवग्गसाहस्सीणं'-अर्थात् बल का अर्थ है सैनिक। समूह को भी बल कहते हैं। दोनों को मिलाकर अर्थ होगा-सैनिकसमूह । भाव यह है कि वासुदेव कृष्ण के पास ५६ हजार सैन्य-समूह था। महासेन उस सैन्य-समूह का प्रमुख था। ___ वासुदेव कृष्ण का राज्य तीन खंडों में था। इतने बड़े प्रदेश में ५६ हजार ही सैनिक कैसे हो सकते हैं? तीनों खंडों की सुरक्षार्थ तो करोड़ों सैनिक अपेक्षित हैं। फिर सूत्रकार ने जो ५६ हजार सैनिक बताये इसका क्या कारण है? इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार हो सकता है कि 'बलवग्ग' शब्द सैन्यसमूह का बोधक है। सैन्यसमूह का अर्थ है-सैनिकों का समुदाय, अतः सूत्रकार ने जो बलवर्ग शब्द दिया है यह सैनिक दलों-सैनिक टुकड़ियों का परिचायक है। फिर एक सैनिक दल में भले ही हजारों सैनिकों की संख्या हो। अतः यहाँ यही भाव निष्पन्न होता है कि कृष्ण महाराज के पास ५६ हजार सैनिक-समुदाय थे। ईसर (ईश्वर) याने युवराज । तलवर- राजा के कृपापात्र को अथवा जिन्होंने राजा की ओर से उच्च आसन (पदवी विशेष) प्राप्त कर लिया है, ऐसे नागरिकों को तलवर कहते हैं। जिसके निकट दोदो योजन तक कोई ग्राम न हो उस प्रदेश को मडम्ब कहते हैं, मडम्ब के अधिनायक को माडम्बिक कहा जाता है। कौटुम्बिक-कुटुम्बों के स्वामी को कौटुम्बिक और व्यापारी पथिकों के समूह के नायक को सार्थवाह कहते हैं। 'अद्धभरहस्स'- इसमें दो पद हैं -एक अर्ध और दूसरा भरत। अर्द्ध आधे को कहते हैं, भरत का अर्थ है भारतवर्ष । भरतक्षेत्र का अर्द्ध चन्द्र जैसा आकार है। तीन ओर लवणसमुद्र और उत्तर में चल्लहिमवन्त पर्वत है। अर्थात् लवणसमुद्र और चुल्लहिमवन्त पर्वत से उसकी सीमा बंधी हुई है। भारत के मध्य में वैताढ्य पर्वत है। इस से भरतक्षेत्र के दो भाग हो जाते हैं। वैताढ्य की दक्षिण ओर का दक्षिणार्ध भरत और उत्तर की ओर का उत्तरार्ध भरत है। चुल्लहिमवन्त पर्वत के ऊपर से निकलने वाली गंगा और सिन्धु नदियाँ वैताढ्य की गुफाओं से निकलकर लवणसमुद्र में मिलती हैं। इससे भरत के छह विभाग होते हैं। इन्हीं छह विभागों को छह खंड कहते हैं। चक्रवर्ती का राज्य इन छह खंडों में होता है और वासुदेव का तीन खंडों में अर्थात् अर्द्ध भरत में होता है। महाराज कृष्ण वासुदेव थे, अतः वे अर्द्ध भरत पर शासन कर रहे थे। ७-तत्थ णं बारवईए नयरीए अंधगवण्ही नाम राया परिवसइ। महया हिमवंत०१ वण्णओ। तए णं सा धारिणी देवी अण्णया कयाई तंसि तारिसगंसि सयणिजंसि एवं जहा महब्बले सुमिणदंसण-कहणा, जम्मं बालत्तणं कलाओ य। जोव्वण-पाणिग्गहणं, कण्णा वासा य भोगा य॥२ नवरं गोयमोरे अट्ठण्हं रायवरकण्णाणं एगदिवसेणं पाणिं गेण्हार्वेति, अट्ठट्ठओ दाओ। उस द्वारका नगरी में अन्धकवृष्णि नाम का राजा निवास करता था। वह हिमवान्-हिमालय पर्वत की तरह महान् था। (उसकी ऋद्धि-समृद्धि का वर्णन औपपातिक सूत्र में किया गया है।) अन्धकवृष्णि अंगसुत्ताणि-भाग ३, पृ.५४३. में यह पाठ इस प्रकार हैहिमवंत-[महंत-मलय-मंदर-महिंदसारे] वण्णओ। [ ] इतना पाठ अधिक है। यह गाथा अंगसुत्ताणि में नहीं है। M.C. Modi द्वारा सम्पादित अंतगड में 'गोयमो नामेणं' पाठ है। ३.
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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