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________________ षष्ठ वर्ग] [११३ करते हुए यहाँ पधारे हैं, यहाँ आ चुके हैं, यहाँ विराजमान हैं । इसी राजगृह नगर के बाहर, गुणशील चैत्य में संयमियों के योग्य स्थान को ग्रहण करके संयम और तप से आत्मा को भावित कर रहे हैं। हे देवानुप्रियो ! तथारूप-महाफल की प्राप्ति कराने रूप स्वभाव वाले अर्थात् अरिहंत के गुणों से युक्त भगवान् के नाम (पहचान के लिये बनी हुई लोक में रूढ संज्ञा) गोत्र (गुण के अनुसार दिया हुआ नाम) को भी सुनने से महत्फल की प्राप्ति होती है, तो फिर उनके निकट जाने, स्तुति करने, नमस्कार करने, संयमयात्रादि की समाधिपृच्छा करने और उनकी उपासना करने से होने वाले फल की तो बात ही क्या? अर्थात् निश्चय ही महत्फल की प्राप्ति होती है। उनके एक भी आर्य (श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त कराने वाले) और धार्मिक उत्तम वचन को सुनने से] और विपुल अर्थ को ग्रहण करने से होने वाले फल की तो बात ही क्या है?" सुदर्शन का वन्दनार्थ गमन ९-तए णं तस्स सुदंसणस्स बहुजणस्स अंतिए एयं अटुं सोच्चा निसम्म अयं अज्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था-एवं खलु समणे भगवं महावीरे जाव' विहरइ। तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वंदामि णमंसामि; एवं संपेहेइ, संपेहेत्ता जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव एवं वयासी • "एवं खलु अम्मयाओ! समणे भगवं महावीरे जाव३ विहरइ। तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वंदामि नमसामि जाव [ सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं] पज्जुवासामि।" तए णं सुदंसणं सेटुिं अम्मापियरो एवं वयासी-एवं खलु पुत्ता! अज्जुणए मालागारे जाव घाएमाणे-घाएमाणे विहरइ। तं मा णं तुमं पुत्ता! समणं भगवं महावीरं वंदए निग्गच्छाहि, मा णं तव सरीरयस्स वावत्ती भविस्सइ। तुमण्णं इहगए चेव समणं भगवं महावीरं वंदाहि।" तए णं से सुदंसणे सेट्ठी अम्मापियरं एवं वयासी-"किण्णं अहं अम्मायाओ! समणं भगवं महावीरं इहमागयं इह पत्तं इह समोसढं इह गए चेव वंदिस्सामि नमंसिस्सामि? तं गच्छामि णं अहं अम्मयाओ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे समणं भगवं महावीरं वदामि नमसामि जाव पज्जुवासामि।" तए णं सुदंसणं सेटुिं अम्मापियरो जाहे नो संचाएंति बहूहिं आघवणाहिं जाव' परूवेत्तए ताहे एवं वयासी-"अहासुहं देवाणुप्पिया!" ____तए णं से सुदंसणे अम्मापिईहिं अब्भणुण्णाए समाणे पहाए सुद्धप्पावेसाइं जाव मंगलाई वत्थाई पवरपरिहिए अप्पमहग्घाभरणालंकिय] सरीरे सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता पायविहारचारेणं रायगिहं नयरं मझमझेणं निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणस्स अदूरसामंतेणं जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए। १. इसी सूत्र में ३. इसी सूत्र में ५. वर्ग ३, सूत्र १८. २. वर्ग ५. सूत्र ४. ४. वर्ग ६. सूत्र ५.
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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