SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 95
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५४] [उपासकदशांगसूत्र आखेट हेतु शिकारी कुत्ते आदि पालना, चूहों के लिए बिल्लियाँ पालना-ये सब भी असतीजन-पोषण के अन्तर्गत आते है। - अनर्थदण्ड-विरमण के अतिचार ५२. तयाणंतरं च णं अणदुदंडवेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तंजहा--कंदप्पे, कुक्कुदूए, मोहरिए, संजुत्ताहिगरणे, उवभोगपरिभोगाइरित्ते। उसके बाद श्रमणोपासक को अनर्थदंड-विरमण व्रत के पांच अतिचारों को जानना चाहिए, उनका आचरण नहीं करना चाहिए। वे इस प्रकार है-- कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, संयुक्ताधिकरण तथा उपभोगपरिभोगातिरेक। विवेचन कन्दर्प--काम-वासना को भड़काने वाली चेष्टाएँ करना। कौत्कुच्य--बहुरूपियों की तरह भद्दी व विकृत चेष्टाएँ करना। मौखर्य--निरर्थक डींगें हांकना, व्यर्थ बातें बनाना, बकवास करना। संयुक्ताधिकरण--शस्त्र आदि हिंसामूलक साधनों को इकट्ठा करना। उपभोग-परिभोगातिरेक-- उपभोग तथा परिभोग का अतिरेक-अनावश्यक वृद्धि-उपभोगपरिभोग संबंधी सामग्री तथा उपकरणों को बिना आवश्यकता के संगृहीत करते जाना। ये इस व्रत के अतिचार है। सामायिक व्रत के अतिचार ५३. तयाणंतरं च णं सामाइयस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा तंजहा-मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहाणे, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइअकरणया, सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया। तत्पश्चात् श्रमणोपासक को सामायिक व्रत के पांच अतिचारों को जानना चाहिए, उनका आचरण नहीं करना चाहिए। वे इस प्रकार हैं-- मन-दुष्प्रणिधान, वचन-दुष्प्रणिधान, काय-दुष्प्रणिधान, सामायिक-स्मृति-अकरणता, सामायिक-अनवस्थित-करणता। विवेचन मन-दुष्प्रणिधान-यहाँ प्रणिधान का अर्थ ध्यान या चिन्तन है। दूषित चिन्तन मन-दुष्प्रणिधान कहा जाता है। सामायिक करते समय राग, द्वेष, ममता, आसक्ति संबंधी बातें मन में लाना, घरेलु समस्याओं की चिन्ता में व्यग्र रहना, यह सामायिक का अतिचार है। सामायिक का उद्देश्य जीवन में
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy