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प्रथम अध्ययन : गाथापति आनन्द]
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वेतन न देना, वेतन में अनुचित रूप में कटौती कर देना, किसी की आजीविका में बाधा पैदा कर देना, सेवकों तथा आश्रितों से खूब काम लेना, पर उसके अनुपात में उचित व पर्याप्त भोजन न देना, वेतन न देना इस अतिचार में शामिल है। ऐसा करना बुरा कार्य है, जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ है।
इन अतिचारों में पशुओं की विशेष चर्चा आने से स्पष्ट है कि तब पशु-पालन एक गृहस्थ के जीवन का आवश्यक भाग था। घर, खेती तथा व्यापार के कार्यों में पशु का विशेष उपयोग था। आज सामाजिक स्थितियाँ बदल गई है। निर्दयता, क्रुरता, अत्याचार आदि अनेक नये रूपों में उभरे है। इसलिए धर्मोपासक को अपनी दैनन्दिन जीवन-चर्या को बारीकी से देखते हुए इन अतिचारों के मूल भाव को ग्रहण करना चाहिए और निर्दयतापूर्ण कार्यों का वर्जन करना चाहिए। सत्यव्रत के अतिचार
४६. तयाणंतरं च णं थूलगस्स मुसावायवेरमणस्स पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा। तं जहा-सहसा-अब्भक्खाणे, रहसा-अब्भक्खाणे, सदारमंतभेए, मोसोवएसे, कूडलेहकरणे। । तत्पश्चात् स्थूल मृषावादविरमण व्रत के पांच अतिचारों को जानना चाहिए, उनका आचरण नहीं करना चाहिए। वे इस प्रकार है
सहसा-अभ्याख्यान, रहस्य-अभ्याख्यान, स्वदारमंत्रभेद, मृषोपदेश, कूटलेखकरण। विवेचन
सहसा-अभ्याख्यान-किसी पर एकाएक बिना सोचे-समझे झूठा आरोप लगा देना। रहस्य-अभ्याख्यान-किसी के रहस्य-गोपनीय बात को प्रकट कर देना। स्वदारमंत्रभेद-अपनी पत्नी की गुप्त बात को बाहर प्रकट कर देना। मृषोपदेश-किसी को गलत राय या असत्यमूलक उपदेश देना।
कूटलेखकरण-खोटा या झूठा लेख लिखना, दूसरे को ठगने या धोखा देने के लिए झूठे, जाली कागजात तैयार करना।
सहसा अभ्याख्यान-सहसा का अर्थ एकाएक है। जब कोई बात बिना सोचे-विचारे भावुकतावश झट से कही जाती है, वहाँ इस शब्द का प्रयोग होता है। ऐसा करने में विवेक के बजाय भावावेश अधिक काम करता है । सहसा अभ्याख्यान का अर्थ है किसी पर एकाएक बिना सोचे-विचारे दोषारोपण करना। यदि यह दोषारोपण दुर्भावना, दुर्विचार और संक्लेशपूर्वक होता है तो अतिचार नहीं रहता, अनाचार हो जाता है। वहाँ उपासक का व्रत भग्न हो जाता है। सहसा बिना विचारे ऐसा करने में कुछ हलकापन है। पर, उपासक को रोष या भावावेशवश भी इस प्रकार किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। इससे व्रत में दुर्बलता या शिथिलता आती है।