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________________ २२] [उपासकदशांगसूत्र करेत्ता वंदइ नमसइ जाव' पज्जुवासइ। तब आनन्द गाथापति को इस वार्ता से-प्रसंग से नगर के प्रमुख जनों को भगवान् की वन्दना के लिए जाते देखकर ज्ञात हुआ, श्रमण भगवान् महावीर [यथाक्रम आगे से आगे विहार करते हुए, ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए--एक गांव से दूसरे गांव का स्पर्श करते हुए यहां आए हैं , संप्राप्त हुए हैं, समवसृत हुए हैं,--पधारे हैं। यहीं वाणिज्यग्राम नगर के बाहर दूतीपलाश चैत्य में यथोचित स्थान में टिके है,] संयम और तपपूर्वक आत्म-रमण में लीन हैं। इसलिए मैं उनके दर्शन का महान् फल प्राप्त करूं। [ऐसे अर्हत् भगवान् के नाम, गोत्र का सुनना भी बहुत बड़ी बात है, फिर अभिगमन--सम्मुख जाना, वन्दना, नमन, प्रतिपृच्छा--जिज्ञासा करना-उनसे पूछना, पर्युपासना करना--इनका तो कहना ही क्या? सद्गुण-निप्पन्न, सद्धर्ममय एक सुवचन का श्रवण भी बहुत बड़ी बात है; फिर विपुल-- विस्तृत अर्थ के ग्रहण की तो बात ही क्या? इसलिए अच्छा हो, मैं जाऊं और श्रमण भगवान् महावीर को वन्दन करूं, सत्कार करुं तथा सम्मान करूं । भगवान् कल्याण हैं, मंगल हैं, देव हैं ,तीर्थ-स्वरूप हैं, इनको पर्युपासना करूं।] आनन्द के मन में यों विचार आया। उसने स्नान किया, शुद्ध तथा सभा-योग्य मांगलिक वस्त्र अच्छी तरह पहने। थोड़े से किन्तु बहुमूल्य आभरणों से शरीर को अलंकृत किया, अपने घर से निकला, निकल कर कुरंट-पुष्पों की माला से युक्त छत्र धारण किये हुए, पुरूषों से घिरा हुआ, पैदल चलता हुआ वाणिज्यग्राम नगर के बीच में से गुजरा जहां दूतीपलाश चैत्य था, भगवान् महावीर थे, वहां पहुंचा। पहुंचकर तीन बार आदक्षिण--प्रदक्षिणा की, वन्दन किया नमस्कार किया, पर्युपासना की।. धर्म-देशना ११. तए णं समणे भगवं महावीरे आणंदस्स गाहावइस्स तीसे य महइ-महालियाए परिसाए जाव धम्म-कहा (इसि-परिसाए, मुणि-परिसाए, जइ-परिसाए, देव-परिसाए, अणेग सयाए, अणेग-सयवंदाए, अणेय-सय-वंद-परिवाराए, ओहबले, अइबले, महब्बले, अपरिमिय-बल-वीरिय--तेय--माहप्प--कंतिजुत्ते, सारद-नवत्थणिय-महुर-गंभीर-कोंचणिग्घोस-दुंदुभिस्सरे, उरे वित्थडाए, कठेऽवट्ठियाए, सरस्सईए, जोयणणीहारिणा सरेणं अद्धमागहाए भासाए भासति, अरिहा धम्म परिकहेइ तेसिं सव्वेसिं आरियमणारियाणं अगिलाए धम्ममाइक्खइ। सा वियणं अद्धमागहा भासा तेसिं सव्वेसिं आरियमणारियाणं अप्पणो सभासाए परिणमइ। तं जहा--अत्थि लोए, अत्थि अलोए, एवं जीवा, अजीवा, बंधे, मोक्खे, पुण्णे, पावे, आसवे, संवरे, वेयणा, णिजरा, अरिहंता, चक्कवट्टी, बलदेवा, वासुदेवा, नरगा, नेरइया, तिरक्खजोणिया, तिरिखजोणिणीओ,माया, पिया रिसयो, देवा, देवलोया, सिद्धी, सिद्धा, परिणिव्वाणं, परिणिव्वुया, अत्थि पाणाइवाए, मुसावाए, अदिण्णीदाणे, १. देखें सूत्र-संख्या २
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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