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________________ २३२] [ ज्ञाताधर्मकथा एवं परिजनों को जिमाया, यावत् उनकी अनुमति ली । अनुमति लेकर गाड़ी-गाड़े जोते। जोत कर चम्पा नगरी के बीचोंबीच होकर बाहर निकले। निकल कर जहां गंभीर नामक पोतपट्टन (बन्दरगाह) था, वहाँ आये। ५५ – उवागच्छित्ता सगडिसागडियं मोयंति, मोइत्ता पोयवहणं सज्जेंति, सज्जित्ता गणिमस्य धरिमस्स य मेज्जस्स य परिच्छेज्जस्स य चउव्विहस्स भंड़गस्स भरेंति, भरित्ता तंडुलाण य समियरस य तेल्लस्स य गुलस्स य घयस्स य गोरसस्स य उदयस्स य उदयभायणाय ओ •य सज्जाण य तणस्स य कट्ठस्स य पावरणाण य पहरणाण य अन्नेसिं च बहूणं पोयवहणपाउग्गाणं दव्वाणं पोयवहणं भरेंति । भरित्ता सोहणंसि तिहि करण - नक्खत्त-मुहुत्तंसि विपुलं असणं पाणं खाइमं साइमं उवक्खडावेंति, उवक्खडावित्ता मित्त-णाइ नियग-सयण-संबन्धि-परियणं आपुच्छंति, आपुच्छित्ता जेणेव पोयट्ठाणे तेणेव उवागछंति । । गंभीर नामक पोतपट्टन में आकर उन्होंने गाड़ी - गाड़े छोड़ दिए । छोड़कर जहाज सज्जित किये। सज्जित करके गणिम, धरिम, मेय और परिच्छेद्य-चार प्रकार का भांड भरा। भरकर उसमें चावल, आटा, तेल, घी, गोरस (दही), पानी, पानी के बरतन, औषध, भेषज, घास, लकड़ी, वस्त्र, शस्त्र तथा और भी जहाज में रखने योग्य अन्य वस्तुएँ जहाज में भरीं । भर कर प्रशस्त तिथि, करण, नक्षत्र और मुहूर्त में अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य तैयार करवाया। तैयार करवा कर मित्रों ज्ञातिजनों, निजजनों, स्वजनों, सम्बन्धियों एवं परिजनों को जिमा कर उनसे अनुमति ली । अनुमति लेकर जहाँ नौका का स्थान था, वहाँ (समुद्र किनारे) आये । - ५६ – तए णं तेसिं अरहन्नगपामोक्खाणं जाव [ संजुत्ता- नावा ] वाणियगाणं परियणा जाव ताहिं [ इट्ठाहिं कंताहिं पियाहिं मणुण्णाहिं मणमाहिं ओरालाहिं ] वग्गूहिं अभिनंन्दन्ताय अभिमाणा य एवं वयासी - 'अज्ज ! ताय ! भाय ! माउल ! भाइणेज्ज ! भगवया समुद्देणं अभिरक्खिमाणा अभिरक्खिज्जमाणा चिरं जीवह, भद्दं च भे, पुणरवि लद्धट्ठे कयकज्जे अणहसमग्गे नियगं घरं हव्वमागए पासामो' त्ति कट्टु ताहिं सोमाहि निद्धाहिं दीहाहिं सप्पिवासाहिं पप्पुयाहिं दिट्ठीहिं निरिक्खमाणा मुहुत्तमेत्तं संचिट्ठति । तत्पश्चात् उन अर्हन्नक आदि यावत् नौका- वणिकों के परिजन (परिवार के लोग) यावत् [ इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ, मनोरम एवं उदार ] वचनों से अभिनन्दन करते हुए और उनकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार बोले ‘हे आर्य (पितामह) ! हे तात ! हे भ्रात ! हे मामा ! हे भागिनेय ! आप इस भगवान् समुद्रद्वारा पुनः - पुनः रक्षण किये जाते हुए चिरजीवी हों। आपका मंगल हो। हम आपको अर्थ का लाभ करके, इष्ट कार्य सम्पन्न करके, निर्दोष - विना किसी विघ्न के और ज्यों का त्यों घर पर आया शीघ्र देखें।' इस प्रकार कह कर सोम, स्नेहमय, दीर्घ, पिपासा वाली - सतृष्ण और अश्रुप्लावित दृष्टि से देखते-देखते वे लोग मुहूर्त्तमात्र अर्थात् थोड़ी देर तक वहीं खड़े रहे । ५७ - तओ समाणिएसु पुप्फबलिकम्मेसु दिन्नेसु सरस-रत्तचंदण - दद्दर- पंचंगुलितलेसु, अणुक्खित्तंसि धूवंसि, पूइएस समुद्दवाएसु संसारियासु वलयबाहासु, ऊसिएसु सिएसु झयग्गेसु, पडुप्पवाइएसु तूरेसुं, जइएसु सव्वसउणेसु, गहिएसु रायवरसासणेसु, महया उक्किट्ठसीहनाय जाव
SR No.003446
Book TitleAgam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_gyatadharmkatha
File Size14 MB
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