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________________ अष्टम शतक : उद्देशक - २ २६३ जहा निरयभवत्था (सु. ७१ ) । [७४ प्र.] भगवन् ! देवभवस्थ जीव ज्ञानी हैं या अज्ञानी हैं ? [७४ उ.] गौतम ! निरयभवस्थ जीवों के समान (सू. ७१ के अनुसार) इनके विषय में कहना चाहिए । ७५. अभवस्था जहा सिद्धा (सु ३८ ) । ६ । [ ७५ ] अभवस्थ जीवों के विषय में सिद्धों की तरह (सू. ३८ के अनुसार) जानना चाहिए। (छठा द्वार) ७६. भवसिद्धिया णं भंते ! जीवा किं नाणी० ? जहा सकाइया (सु. ४१ ) । [७६ प्र.] भगवन् ! भवसिद्धिक (भव्य) जीव ज्ञानी हैं या अज्ञानी हैं ? [७६ उ.] गौतम ! इनका कथन सकायिक जीवों के समान (सू. ४१ के अनुसार) जानना चाहिए। ७७. अभवसिद्धिया णं० पुच्छा । गोयमा ! नो नाणी; अण्णाणी, तिणिण अण्णाणाई भयणाए । [७७ प्र.] भगवन् ! अभवसिद्धिक (अभव्य) जीव ज्ञानी हैं या अज्ञानी हैं ? [७७ उ.] गौतम ! ये ज्ञानी नहीं, किन्तु अज्ञानी हैं। इनमें तीन अज्ञान भजना से होते हैं। ७८. नोभवसिद्धियंनोअभवसिद्धिया णं भंते ! जीवा० ? जहा सिद्धा (सु. ३८ ) । ७। [७८ प्र.] भगवन् ! नोभवसिद्धिक-नोअभवसिद्धिक जीव ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी हैं ? [ ७८ उ.] गौतम ! इनके सम्बंध में सिद्ध जीवों के समान (सू. ३८ के अनुसार) कहना चाहिए। (सप्तम द्वार) ७९. सण्णी णं० पुच्छा। जहा सइंदिया (सु. ४४ ) । [७९ प्र.] भगवन् ! संज्ञीजीव ज्ञानी है या अज्ञानी हैं ? [७९ उ.] गौतम ! सेन्द्रिय जीवों के कथन के समान (सू. ४४ के अनुसार) इनके विषय में कहना चाहिए । ८०. असण्णी जहा वेइंदिया (सु. ४६ ) । [८०] असंज्ञी जीवों के विषय में द्वीन्द्रिय जीवों के समान (सू. ४६ के अनुसार) कहना चाहिए ।
SR No.003443
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapati Sutra Part 02 Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages669
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_bhagwati
File Size14 MB
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