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________________ समवायांग के तृतीय समवाय का प्रथम सूत्र – 'तओ दंडा पण्णत्ता..... ' है तो प्रश्नव्याकरण ४३० में भी तीन दण्ड का उल्लेख है। समवायांग के तृतीय समवाय का द्वितीय सूत्र – 'तओ गुत्तीओ पण्णत्ता....' है तो प्रश्नव्याकरण ३१ में भी तीन गुप्तियों का उल्लेख हुआ है। समवायांग के तृतीय समवाय का तृतीय सूत्र – 'तओ सल्ला पण्णत्ता......' है तो प्रश्नव्याकरण ४३२ में भी तीन शल्यों का वर्णन है । समवायांग के तृतीय समवाय का चतुर्थ सूत्र – 'तओ गारवा पण्णता.......' है तो प्रश्नव्याकरण ३३ में भी गर्व के तीन भेद बताये हैं । समवायांग सूत्र के तृतीय समवाय का पांचवाँ सूत्र- 'तओ विराहणा पण्णता....... है तो प्रश्नव्याकरण ४३४ में भी तीन विराधनाओं का उल्लेख है। समवायांग सूत्र के चतुर्थ समवाय का चतुर्थ सूत्र - ' चत्तारि सण्णा पण्णत्ता....' है तो प्रश्नव्याकरण ४३५ में भी चार संज्ञाओं का वर्णन है। समवायांग के पांचवें समवाय का दूसरा सूत्र – पंच महव्वया पण्णत्ता.........' है तो प्रश्नव्याकरण ४१६ में भी पांच महाव्रतों का वर्णन है। समवायांग के पांचवें समवाय का चतुर्थ सूत्र – 'पंच आसवेदारा पण्णत्ता ...... ' है तो प्रश्नव्याकरण ४३७ में भी पांच आश्रवद्वारों का निरूपण हुआ है। समवायांग के पांचवें समवाय का पांचवां सूत्र 'पंच संवरदारा पण्णत्ता.....' है तो प्रश्नव्याकरण ४१८ में भी पांच संवरद्वारों का विश्लेषण है । समवायांग के सातवें समवाय का पहला सूत्र - 'सत्त भयट्ठाणा पण्णत्ता........' है तो प्रश्नव्याकरण४३९ में भी सात भयस्थान बताये हैं। समवायांग के आठवें समवाय का पहला सूत्र – 'अट्ठ मयट्ठाण पण्णत्ता......' है तो प्रश्नव्याकरण ४४० में भी आठ मदस्थान बतये हैं। समवायांग के नौवें समवाय का प्रथम सूत्र - 'नव बंभचेरगुत्तीओ पण्णत्ताओ......' है तो प्रश्नव्याकरण ४४१ में भी नौ ब्रह्मचर्यगुप्तियों का उल्लेख है। प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार ४३०. ४३१. ४३२. ४३३. ४३४. ४३५. ४३६. ४३७. ४३८. ४३९. प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार ४४०. प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार ४४१. प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार प्रश्नव्याकरण ५ संवरद्वार [ ७४]
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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