SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 168
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ षोडशस्थानक-समवाय] [४९ संतेगइआ भवसिद्धिआ जीवा जे पण्णरसहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिस्संति बुझिस्संति मुच्चिस्संति परिनिव्वाइस्संति सव्वदुक्खाणमंतं करिस्संति। महाशुक्र कल्प में कितनेक देवों की स्थिति पन्द्रह सागरोपम कही गई है। वहाँ जो देव नन्द, सुनन्द, नन्दावर्त, नन्दप्रभ, नन्दकान्त, नन्दवर्ण, नन्दलेश्य, नन्दध्वज, नन्दशृंग, नन्दसृष्ट, नन्दकूट और नन्दोत्तरावतंसक नाम के विशिष्ट विमानों में देव रूप से उत्पन्न होते हैं, उन देवों की उत्कृष्ट स्थिति पन्द्रह सागरोपम कही गई है। वे देव पन्द्रह अर्धमासों (साढ़े सात मासों) के बाद आन-प्राण उच्छ्वासनि:श्वास लेते हैं। उन देवों को पन्द्रह हजार वर्षों के बाद आहार की इच्छा उत्पन्न होती है। कितनेक भव्यसिद्धिक जीव ऐसे हैं, जो पन्द्रह भव ग्रहण करके सिद्ध होंगे, बुद्ध होंगे, कर्मों से मुक्त होंगे, परिनिर्वाण को प्राप्त होंगे और सर्व दुःखों का अन्त करेंगे। ॥ पंचदशस्थानक समवाय समाप्त॥ षोडशस्थानक-समवाय ११०-सोलस य गाहा-सोलसगा पण्णत्ता,तं जहा–१समए 'वेयालिए रेउवसग्गपरिन्ना ४इत्थीपरिण्णा पनिरयविभत्ती महावीरथुई "कुसीलपरिभासिए वीरिए धम्मे समाही ११मग्गे १२ समोसरणे १३ आहातहिए १४ गंथे १५जमईए गाहासोलसमे १६ सोलसगे। सोलह गाथा-षोडशक कहे गये हैं । जैसे-१ समय, २ वैतालीय, ३ उपसर्ग परिज्ञा, ४ स्त्रीपरिज्ञा, ५ नरकविभक्ति, ६ महावीरस्तुति, ७ कुशीलपरिभाषित, ८ वीर्य, ९ धर्म, १० समाधि, ११ मार्ग, १२ समवसरण, १३ याथातथ्य, १४ ग्रन्थ, १५ यमकीय और १६ सोलहवाँ गाथा। विवेचन-सूत्रकृतांग सूत्र के प्रथम श्रुतस्कन्ध में 'समय' आदि नाम वाले सोलह अध्ययन हैं, इसलिए वे 'गाथा-षोडशक' के नाम से प्रसिद्ध हैं। पहले अध्ययन में नास्तिक आदि के समयों (सिद्धान्तों या मतों) का प्रतिपादन किया गया है। दूसरे अध्ययन की रचना वैतालीय छन्दों में गई है. अतः वैतालीय कहते हैं । इसी प्रकार शेष अध्ययनों का कथन जान लेना चाहिए। समवसरण-अध्ययन में तीन सौ तिरेसठ मतों का समुच्चय रूप से वर्णन किया गया है। सोलहवें अध्ययन को पूर्वोक्त पन्द्रह अध्ययनों के अर्थ का गान करने से, गाथा नाम से कहा गया है। १११-सोलस कसाया पण्णत्ता, तं जहा-अणंताणुबंधी कोहे, अणंताणुबंधी माणे, अणंताणुबंधी माया, अणंताणुबंधी लोभे; अपच्चक्खाणकसाए कोहे, अपच्चक्खाणकसाए माणे अपच्चक्खाण-कसाए माया अपच्चक्खाणकसाए लोभे, पच्चक्खाणावरणे कोहे, पच्चक्खाणावरणे माणे, पच्चक्खाणावरणा माया, पच्चक्खाणावरणे लोभे; संजलणे कोहे, संजलणे माणे, संजलणा माया, संजलणे लोभे। ___ कषाय सोलह कहे गये हैं, जैसे- अनन्तानुबन्धी क्रोध, अनन्तानुबन्धी मान, अनन्तानुबन्धी माया, अनन्तानुबन्धी लोभ; अप्रत्याख्यानकषाय क्रोध, अप्रत्याख्यानकषाय मान, अप्रत्याख्यानकषाय माया, अप्रत्याख्यानकषाय लोभः प्रत्याख्यानावरण क्रोध प्रत्याख्यानावरण मान, प्रत्याख्यानावरण माया.
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy