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________________ ४२] [समवायाङ्गसूत्र ३. सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान-प्रथम बार उपशम सम्यक्त्व प्राप्त करते हुए जीव मिथ्यात्व कर्म के मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृतिरूप तीन विभाग करता है। इनमें से उपशम सम्यक्त्व का अन्तर्मुहूर्त काल पूर्ण होते ही यदि सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति का उदय हो जाता है, तो वह अर्धसम्यक्त्वी और अर्धमिथ्यात्वी जैसी दृष्टिवाला हो जाता है। इसे ही तीसरा सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान कहते हैं। इसका काल अन्तर्मुहूर्त ही है। अतः उसके पश्चात् यदि सम्यक्त्वप्रकृति का उदय हो जाये तो वह ऊपर चढ़कर सम्यक्त्वी बन जाता है और यदि मिथ्यात्व कर्म का उदय हो जाये, तो वह नीचे गिरकर मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में आ जाता है। ४. अविरतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान-दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम, क्षय या क्षयोपशम करके जीव सम्यग्दृष्टि बनता है। उसे आत्मस्वरूप का यथार्थ भान हो जाता है, फिर भी चरित्रमोहनीय कर्म के उदय से वह सत्य मार्ग पर चलने में असमर्थ रहता है और संयमादि के पालन करने की भावना होने पर भी व्रत,संयमादि का लेश मात्र भी पालन नहीं कर पाता है। विरति या त्याग के अभाव से इसे अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान कहा जाता है। इस गुणस्थान को चारों गतियों के संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव प्राप्त कर सकते हैं। ५.विरताविरत गुणस्थान-जब उक्त सम्यग्दृष्टि जीव के अप्रत्याख्यान कषाय का उपशम या क्षयोपशम होता है, तब वह त्रसहिंसादि स्थूल पापों से विरत होता है, किन्तु स्थावरहिंसादि सूक्ष्म पापों से अविरत ही रहता है। ऐसे देशविरत अणुव्रती जीव को विरताविरत गुणस्थान वाला कहा जाता है। इस गुणस्थान को केवल मनुष्य और कर्मभूमिज कोई सम्यक्त्वी तिर्यंच प्राप्त कर सकते हैं। ६. प्रमत्तसंयत गुणस्थान-जब उक्त सम्यग्दृष्टि जीव के प्रत्याख्यानावरण कषाय का उपशम . या क्षयोपशम होता है, वह स्थूल और सूक्ष्म सभी हिंसादि पापों का त्याग कर महाव्रतों को अर्थात् सकलसंयम को धारण करता है। फिर भी उसके संज्वलन और नोकषायों के तीव्र उदय होने से कुछ प्रमाद बना ही रहता है। ऐसे प्रमादयुक्त संयमी को प्रमत्तसंयत गुणस्थानवाला कहा जाता है। ७. अप्रमत्तसंयत गुणस्थान-जब उक्त जीव के संज्वलन और नोकषायों का मन्द उदय होता है, तब वह इन्द्रिय-विषय, विकथा, निद्रादिरूप सर्वप्रमादों से रहित होकर प्रमादहीन संयम का पालन करता है। ऐसे साधु को अप्रमत्तसंयत गुणस्थान वाला कहा जाता है। - यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि पांचवें से ऊपर के सभी गुणस्थान केवल मनुष्यों के ही होते हैं और सातवें से ऊपर के सभी गुणस्थान उत्तम संहनन के धारक तद्भव मोक्षगामी को होते हैं। हां, ग्यारहवें तक निकट भव्य परुष भी चढ सकता है। किन्त उसका नियम से पतन होता है और अपार्ध पुद्गलपरावर्तन काल तक वह संसार में परिभ्रमण कर सकता है। सातवें गुणस्थान से ऊपर दो श्रेणी होती हैं - उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी। जो जीव चारित्रमोहकर्म का उपशम करता है, वह उपशम श्रेणी चढ़ता है। जो जीव चारित्रमोहकर्म का क्षय करने के लिए उद्यत होता है, वह क्षपक श्रेणी चढ़ता है। दोनों श्रेणी वाले गुणस्थानों का काल अन्तर्मुहूर्त है।
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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