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________________ चतुःस्थानक-समवाय] [११ कितनेक भव्यसिद्धिक जीव ऐसे है जो तीन भव ग्रहण करके सिद्ध होंगे, बुद्ध होंगे, कर्मों से मुक्त होंगे, परम निर्वाण प्राप्त करेंगे और सर्व दु:खों का अन्त करेंगे। ॥त्रिस्थानक समवाय समाप्त। चतुःस्थानक-समवाय २०-चत्तारि कसाया पन्नत्ता,तं जहा-कोहकसाए माणकसाए मायाकसाए लोभकसाए। चत्तारि झाणा पन्नत्ता, तं जहा-अट्टज्झाणे रुद्दज्झाणे धम्मज्झाणे सुक्कज्झाणे। चत्तारि विकहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा-इत्थिकहा भत्तकहा रायकहा देसकहा। चत्तारि सण्णा पन्नत्ता, तं जहाआहारसण्णा भयसण्णा मेहुणसण्णा परिग्गहसण्णा। चउव्विहे बंधे पन्नत्ते, तं जहा-पगइबंधे ठिइबंधे अणुभावबंधे पएसबंधे। चउगाउए जोयणे पन्नत्ते। चार कषाय कहे गये हैं -क्रोधकषाय, मानकषाय, मायाकषाय, लोभकषाय। चार ध्यान कहे गये हैं - आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्म्यध्यान, शुक्लध्यान। चार विकथाएं कही गई हैं, जैसे-स्त्रीकथा, भक्तकथा, राजकथा, देशकथा। चार संज्ञाएं कही गई हैं, जैसे-आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा। चार प्रकार का बन्ध कहा गया है, जैसे- प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभावबन्ध, प्रदेशबन्ध । चार गव्यूति का एक योजन कहा गया है। विवेचन-जो आत्मा को कसे, ऐसे संसार बढ़ाने वाले विकारी भावों को कषाय कहते हैं । चित्त की एकाग्रता को ध्यान कहते हैं । यह एकाग्रता जब इष्ट-वियोग, अनिष्ट-संयोगादि के होने पर उनके दूर करने के रूप में होती है, तब उसे आर्तध्यान कहते हैं। जब वह एकाग्रता हिंसादि पाप करने में होती है, तब उसे रौद्रध्यान कहते हैं। जब वह एकाग्रता जिन-प्रवचन के प्रचार, दया, दान, परोपकार आदि करने में होती है, तब उसे धर्म्यध्यान कहते हैं और जब यह एकाग्रता सर्वशुभ-अशुभ भावों से निवृत्त होकर एकमात्र शुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थिरता रूप होती है, तब उसे शुक्लध्यान कहते हैं । शुक्लध्यान मोक्ष का साक्षात् कारण है और धर्म्यध्यान परम्परा कारण है। आर्तध्यान और रौद्रध्यान संसार-बन्धन के कारण हैं। राग-द्वेषवर्धक निरर्थक कथाओं को विकथा कहते हैं । इन्द्रियों की विषय-प्रवृत्ति को संज्ञा कहते हैं। कर्मों के स्वभाव, स्थिति, फल-प्रदानादि रूप से आत्मा के साथ संबद्ध होने को बंध कहते हैं। प्रस्तुत सूत्रों में इनके चार-चार भेदों को गिनाया गया है। चार कोश या गव्यूति को योजन कहते हैं। २१-अणुराहानक्खत्ते चउत्तारे पन्नत्ते, पुव्वासाढानख्ते चउत्तारे पन्नत्ते।उत्तरासाढानक्खत्ते चउत्तारे पन्नत्ते। अनुराधा नक्षत्र चार तारावाला कहा गया है। पूर्वाषाढा नक्षत्र चार तारावाला कहा गया है। उत्तराषाढा नक्षत्र चार तारावाला कहा गया है। २२-इमीसे णं रयणप्पभाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पन्नत्ता। तच्चाए णं पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं चत्तारि सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता।असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं चत्तारि पलिओवमाइं ठिई पन्नता। सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु अत्थेगइयाणं
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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