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________________ इच्छाएँ तो और भी हैं, पर ये तीन खास इच्छाएँ मेरी अधूरी रह गईं । मैंने संसार को इस छोर से उस छोर तक अपनी विजय - दुन्दुभि से मुखरित कर दिया । सोने की लंका बसाई और अनेक अद्भुत करिश्मे दिखाये । किन्तु फिर भी मेरी असंख्य इच्छाएँ अधूरी रह गईं। बस, उन्हीं दुःख और दर्द से मैं छटपटा रहा हूँ । उन्हीं इच्छाओं में से मुख्य ये तीन इच्छाएँ थीं । के जब रावण जैसा वैभव - सम्पन्न और पराक्रमी व्यक्ति भी यह बात कहता है कि मेरी इच्छाएँ अपूर्ण रह गईं, तो दूसरों की तो विसात ही क्या है ? साधारण लोगों ही इच्छाएँ कहाँ तक पूर्ण हो सकती हैं ? अनन्तकाल से स्वर्ग, नरक आदि के चक्कर पर चक्कर लगाते रहे, इच्छाएँ बनती रहीं, मिटती रहीं और फिर दुगुने वेग से उफनती रहीं । स्वर्ग के साम्राज्य का स्वामी बनने पर भी आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हुई । चक्रवर्ती और सम्राट् बनने पर भी आकांक्षाएँ अधूरी ही छोड़कर जाना पड़ा । इच्छाओं का पेट ऐसा है, जो कभी नहीं भर सकता । मन का पेट : एक करोड़पति सेठ ने कहा कि मैं धर्माचरण के लिए अच्छा भाव रखता हूँ, सत्संग में जाने का भाव भी काफी है परन्तु पेट के लिए इतनी दौड़-धूप करनी पड़ती है कि अवकाश ही नहीं निकल सकता । तो क्या वास्तव में ही पेट इतना बड़ा है कि करोड़पति हो जाने के बाद भी वह नहीं भरता । बात ऐसी नहीं है । वास्तव में यह चमड़े का पेट तो बहुत 184 केस स्वर्ग के साम्राज्य का स्वामी बनने पर भी आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हुई । इच्छाओं का पेट ऐसा है, जो कभी नहीं भर सकता । केली
SR No.003430
Book TitleAnand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni
PublisherSugal and Damani Chennai
Publication Year2007
Total Pages346
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Discourse
File Size8 MB
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