________________
आत्म-विचारणा
पूर्वाग्रह टूट गए
इन्द्रभूति गौतम जब तीर्थकर महावीर की धर्मसभा में पहुंचे तो उनकी मनःस्थिति क्या रही होगी यह कहना कठिन है । महावीर के प्रति उनकी धारणाएं बहुत भिन्न थी। महावीर एक राजकुमार थे । बयालीस वर्ष के तेजस्वी युवक थे । इस तूफानी यौवन में जिसप्रकार विजय एवं राज्यविस्तार का उल्लास क्षत्रियों का सहज मनोवेग माना जाता था उसीप्रकार इस युग में अध्यात्म एवं तत्वज्ञान की चर्चा तथा गृहत्याग एवं सन्यास भी क्षत्रियकुमारों का एक रुचिकर विषय बन रहा था। अनेक क्षत्रियकुमार युवावस्था में ही गृहत्याग कर सन्यास की ओर बढ़ रहे थे और अध्यात्मविद्या में ब्रह्मा ऋषियों से भी दो कदम आगे जा रहे थे। वैदिक परम्परा में गृहस्थ-ऋषि की परम्परा का प्राधान्य था, किन्तु क्षत्रियकुमारों ने इस परम्परा में नई क्रांति पैदा की। उन्होंने गहत्याग कर सन्यास-प्रव्रज्या ग्रहण की और वह भी जीवन के चतुर्थ आश्रम में नहीं, किन्तु द्वितीय आश्रम में ही। इस आध्यात्मिक उत्क्रांति से ब्राह्मणों से क्षत्रियों की आध्यात्मिक श्रेष्ठता एवं तेजस्विता का प्रभाव चारों ओर फेल चुका था और इन्द्रभूति गौतम पर भी वह प्रभाव किसी
१. इस संबंध में देखिए दीघनिकाय में तथागत का कथन--"तथागत बुद्ध ने कहा
"वाशिष्ठ ब्रह्मा सनत्कुमार ने भी गाथा कही है-गोत्र लेकर चलने वाले जनों
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org