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________________ आनन्द का प्रस्थान | ४९ इस सम्बन्ध में, मेरा जो दृष्टिकोण है, वह आपको बतला दूँ । 'अप्पमहग्घाभरण' का अर्थ साधारण तौर पर यह किया जाता है, कि गहने वजन में अल्प थे, पर मैं समझता हूँ, कि गहने ही अल्प थे। दोनों अर्थों का अन्तरें आपकी समझ में आ जाना चाहिए, बहुत गहने भी वजन में अल्प हो सकते हैं, पर मूल-प -पाठ में ऐसा कोई शब्द नहीं, जिससे 'अप्प - अल्प' को वजन का विशेषण समझा जाए। यहाँ वजन की कोई बात ही नहीं है। अल्प शब्द 'आभरण' का विशेषण है, और उसका सीधा अर्थ यही होता है, कि आनन्द ने जो गहने पहने, वह संख्या में थोड़े थे, किन्तु बहुमूल्य थे । मध्य-काल में गहने पहनने का रिवाज अधिक था । आज कम होता जा रहा है। विशेषत: पुरुष वर्ग बहुत कम गहने पहनता है । बहिनें तो आज भी अपने अङ्ग अङ्ग में गहने पहनती हैं, और इधर मारवाड़ में तो और भी अधिक । उनका वश चले तो वे आँख की पलकों में भी कोई गहना पहन लें, पर उनके बस की बात नहीं है। मैं पूछता हूँ, यह शरीर किसलिए मिला है ? साधना करने के लिए, काम करने के लिए या गहने पहनने के लिए ? आँखें देखने के लिए, कान सुनने के लिए और नाक खुशबू - बदबू मालूम करने के लिए है । परन्तु कान-नाक को छेद छेद कर उन पर भी गहने लाद दिए गए हैं। हाथ पुरुषार्थ करने के लिए हैं, किन्तु उन्हें भी गहनों से विभूषित कर लिया जाता है। पैर चलने-फिरने को हैं, लेकिन वे भी गहनों की घोड़ी बन गए हैं। गर्दन शरीर का महत्त्वपूर्ण भाग है, जो आँख कान आदि अवयवों को अपने ऊपर धारण किए हुए है; किन्तु उसे भी हार आदि अनेक गहनों से लाद लिया जाता है। नारी आभूषण - प्रिय होती है। -- अकेली आँखें कैसे बच गईं, समझ में नहीं आता। इन बेचारियों का क्या अपराध हुआ, कि इन्हें नहीं सिंगारा गया ? अथवा आँखों ने कोई पुण्य किया होगा, कि वे गहनों का बोझा ढोने से बच गईं हैं ? इस प्रकार सारा शरीर गहनों से लाद लिया जाता है, और यह भुला दिया जाता है, कि वास्तव में शरीर किस लिए मिला है ? शरीर का मुख्य उद्देश्य गहने पहनना ही समझ लिया गया है। जहाँ ऐसी स्थूल दृष्टि हो वहाँ सूक्ष्म तत्वों की क्या चर्चा ? आभूषण पहनने की भी एक सीमा होनी चाहिए। यहाँ वजन में कम हों या अधिक हों, यह प्रश्न नहीं है। आनन्द ने जो गहने पहने वे अल्प थे। घर में जो कुछ हो, सब लाद कर वह नहीं चला था । उस समय की सामाजिक परिपाटी को निभाने की दृष्टि से उसने थोड़े से गहने पहन लिए थे, परन्तु थे वे बहु-मूल्य | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003416
Book TitleUpasak Anand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Vijaymuni
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1995
Total Pages222
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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