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________________ १८५ प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः अर्थः-अयज्ञपात्रप्रयोगविषये प्र-उपाभ्याम् उपसर्गाभ्यां परस्माद् युज - धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति । उदा०- ( प्र ) प्रयुङ्क्ते । (उप) उपयुङ्क्ते । आर्यभाषा-अर्थ- (अयज्ञपात्रेषु) यज्ञपात्रों के प्रयोग विषय को छोड़कर (प्रोपाभ्याम् ) प्र और उप उपसर्ग से परे (युज: ) युज् धातु से ( कतीरे) कर्तृवाच्य में (आत्मनेपदम्) होता है। उदा० -(प्र) प्रयुङ्क्ते । प्रयोग करता है। उपयुङ्क्ते । उपयोग करता है। सिद्धि - (१) प्रयुङ्क्ते । प्र+युज्+लट् । प्र+यु श्नम् ज्+त। प्र+यु न ज्+त । प्र+यु न् ज्+त। प्र+यु न् ज्+त । प्र+यु न् ग्+त। प्र+युन्क्+त। प्र+यु — क्+ते । प्रयुङ्क्ते । यहां प्र उपसर्गपूर्वक 'युजिर् योगे (रु०प०) से लट् प्रत्यय और उसके स्थान में आत्मनेपद 'त' आदेश होता है। यहां 'रुधादिभ्यः श्नम्' (३ | १1७८ ) से श्नम् ' विकरण प्रत्यय और 'इनसोरल्लोप:' ( ६ । ४ । ११२) से 'अ' का लोप, 'चोः कुः' (८/२/३०) से युज् धातु के ज् को कवर्ग गकार और 'खरि च' (८ ।४/५४) से ग् को चर् ककार होता है। नश्चापदान्तस्य झलिं' ( ८1३1२४ ) से 'न्' को अनुस्वार आदेश और उसको 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण:' (८।४।५७) से परसवर्ण ङकार होता है। इसी प्रकार उप+युङ्क्ते= उपयुङ्क्ते । प क्ष्णु तेजने (अ०प०) - समः क्ष्णुवः । ६५ । प०वि० - सम: ५ | १ क्ष्णुवः ५ । १ । अन्वयः - समः क्ष्णुवः कर्तरि आत्मनेपदम्। अर्थ:-सम उपसर्गात् परस्मात् क्ष्णु- धातोः कर्तरि आत्मनेपदं भवति । उदा०- (सम्) संक्ष्णुते शस्त्रम् | तीक्ष्णं करोतीत्यर्थः । आर्यभाषा-अर्थ- (समः) सम् उपसर्ग से परे (क्ष्णुवः) क्ष्णु धातु कर्तृवाच्य में (आत्मनेपदम् ) आत्मनेपद होता है। Jain Education International उदा०-सम्-संक्ष्णुते शस्त्रम् । शस्त्र को तेज करता है। सिद्धि - (१) संक्ष्णुते। सम्+क्ष्णु+लट् । सम्+क्ष्णु+शप्+त। सम्+क्ष्णु+०+ते। संक्ष्णुते । यहां 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'क्ष्णु तेजने' (अ०प०) धातु से 'लट्' प्रत्यय और उसके स्थान में आत्मनेपद 'त' आदेश होता है । 'अदिप्रभृतिभ्यः शप:' ( २/४ /७२) से 'शप्' का लुक हो जाता है। से (कर्तीरे) For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003296
Book TitlePaniniya Ashtadhyayi Pravachanam Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanacharya
PublisherBramharshi Swami Virjanand Arsh Dharmarth Nyas Zajjar
Publication Year1997
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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